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अभिनेता रणबीर कपूर की फिल्म ‘एनिमल’ तमाम आलोचनाओं और सोशल मीडिया पर ट्रोल होने के बावजूद सिनेमाघरों में खूब दहाड़ रही है। फिल्म को दर्शक खूब पसंद कर रहे हैं। हालांकि, कुछ दर्शक इसे एक मानसिक बीमार नायक की कहानी बता रहे हैं और इसके कथानक महिला विरोधी मान रहे हैं। कहा ये भी जा रहा है कि इस तरह की फिल्म हिंदी सिनेमा में निर्देशक अनुराग कश्यप बहुत पहले बना चुके हैं। और, उनकी फिल्मों ‘देव डी’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के हीरो भी फिल्म ‘एनिमल’ के हीरो की तरह ही टॉक्सिक थे। ‘अमर उजाला’ से एक खास बातचीत में अनुसार कश्यप ने इन मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखे।
मैं नहीं बना सकता ब्लॉकबस्टर फिल्म
मेरा मानना है कि चर्चा उसी फिल्म की होती है जो फिल्म चलती है। मेरी फिल्म कभी चली ही नहीं क्योंकि मुझे ब्लॉकबस्टर फिल्में बनाना नहीं आता है। समाज में मुझे जो दिखता है, मैं वैसी फिल्में बनाता हूं। ब्लॉकबस्टर सिनेमा बनाने की कला मेरे अंदर नहीं है। फिल्म चलने के कई कारण होते हैं। दर्शक उसके साथ कैसे जुड़तें हैं, कितने शोज मिलते हैं, कितना टाइम मिलता है, इन सबसे फिल्म सफलता तय होती है।
एक था टाइगर आई तो उतार दी गैंग्स ऑफ वासेपुर
जब कोई बड़ी फिल्म रिलीज होने वाली होती है तो छोटी फिल्म को थियेटर से निकाल दिया जाता है। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2’ के रिलीज के एक हफ्ते के बाद ‘एक था टाइगर’ रिलीज हुई और मेरी फिल्म को थियेटर से उतार दिया गया। अक्सर छोटी फिल्मों के साथ ऐसा ही होता है। एक फिल्म रिलीज हुई और एक हफ्ते के अंदर निकाल दी गई क्योंकि सामने बड़ी फिल्म आ गई। जब फिल्म को चलने ही नहीं दिया जायेगा तो फिल्म कैसे चलेगी।
(अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट वन’ 22 जून 2012 को और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट 2’ 8 अगस्त 2012 को रिलीज हुई)
रणबीर कपूर काम के प्रति ईमानदार
मैंने अभी तक रणबीर कपूर की फिल्म ‘एनिमल’ नहीं देखी है। मैंने सुना है कि ‘एनिमल’ रणबीर कपूर के करियर की अब अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है। मुझे पता है कि रणबीर कपूर अपने काम के प्रति कितने ईमानदार है। मैंने उनके साथ ‘बॉम्बे वेलवेट’ में काम किया है। उनकी काम को लेकर एक लगन और समर्पण भाव है। वह बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं।
दर्शकों की पसंद का ‘घूमर’
अभिषेक बच्चन की फिल्म ‘घूमर’ जिसने भी देखी खूब तारीफ की लेकिन यह फिल्म थियेटर में नहीं चली। अभी लोग ओटीटी जी5 पर इसे खूब देख रहे हैं लेकिन थियेटर में रिलीज के समय उसके आगे पीछे इतनी बड़ी बड़ी फिल्में आई कि ‘घूमर’ के बारे में लोगों को पता ही नहीं चला। फिल्ममेकर भी हिम्मत हार जाते हैं कि ऐसी फिल्म बनाऊं कि ना बनाऊं। लोगों को भी समझ में नहीं आता और बाद में जब देखते हैं तो लोगों को फिल्म बहुत अच्छी लगती है और कहते हैं कि वाह, क्या फिल्म बनी है।
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