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एनिमल रिव्यू
– फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
विस्तार
क्या समाज बदल गया है? क्या समाज को हिंसा अधिक पसंद आती है? हाल में रिलीज फिल्म एनिमल को देखकर तो यही प्रतीत हो रहा है। बेहद हिंसक फिल्म होने के बावजूद ‘एनिमल’ कमाई के नए कीर्तिमान गढ़ने की ओर बढ़ चली है। निश्चित रूप से यह बेहद चिंता का विषय है। आखिर ऐसी फिल्मों को क्यों मनाया जा रहा है? सरकार के अधीन बैठा सेंसर बोर्ड ऐसी फिल्मों को रिलीज करने की अनुमति कैसे दे देता है? क्या फिल्म जगत अनियंत्रित हो गया है?
यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिन पर सामूहिक रूप से समाज को चिंतन और मंथन करने की जरूरत है। ऐसी फिल्में अच्छे नागरिक पैदा करने के बजाय समाज में जानवर ही खड़े करेंगी।
एनिमल फिल्म रिलीज होने के बाद जब एक दर्शक से रिव्यू लिया गया तो उसका स्पष्ट कहना था
एनिमल फिल्म को तो एनिमल भी नहीं देखना चाहेंगे। यह इतनी घटिया फिल्म है। जब फिल्म घटिया है तो कमाई कैसे कर रही है? साफ है कि एक्शन से भरी फिल्मों की ओर भारतीय दर्शक, खासकर युवावर्ग ज्यादा आकर्षित होता है। जब बड़े पर्दे की असफलता का दौर शुरू हुआ तो ओटीटी प्लेटफॉर्म की तरफ फिल्म उद्योग बढ़ गया। ओटीटी पर अच्छे कंटेंट के साथ ही घटिया कंटेंट भी परोसा जाने लगा।
ओटीटी की अमर्यादित भाषा को लेकर संसद तक में आवाज उठी, लेकिन उस दिशा में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। ओटीटी पर आज भी घटिया भाषा धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रही है।
सवाल यह उठता है कि सरकार आखिरकार क्या रही है? भारत में हर साल 20 से अधिक भाषाओं में 2000 तक फिल्में बनाई जा रही हैं। यह आंकड़ा हर साल बढ़ता जा रहा है।
किसी भी फिल्म को रिलीज से पहले एक प्रमाण पत्र लेना जरूरी होता है। यह प्रमाण पत्र केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सीबीएफसी देता है, जिसे आमतौर पर सेंसर बोर्ड कहते हैं। सेंसर बोर्ड केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन आता है। फिल्मों को यू, यू/ए, ए और एस प्रमाण पत्र दिए जाते हैं।
यू प्रमाण पत्र की फिल्में परिवार के साथ मिलकर सभी वर्ग के लोग देख सकते हैं। यू/ए प्रमाण पत्र की फिल्म विशेष रूप से 12 साल की उम्र से अधिक के बच्चों और वयस्कों के लिए होती है। ए प्रमाण पत्र की फिल्म केवल वयस्कों के लिए होती है, जबकि एस प्रमाण पत्र की फिल्म डॉक्टर, वकील जैसे विशेष वर्ग के लिए होती है।
एनिमल फिल्म को सेंसर बोर्ड ने ए प्रमाण पत्र दिया है और इसे क्राइम/एक्शन की श्रेणी में रखा गया है। फिल्म में हिंसा को देखकर दर्शक व्यथित हैं। संसद में कांग्रेस की सांसद रंजीत रंजन ने एनिमल फिल्म को लेकर मुद्दा खड़ा किया। उन्होंने यहां तक कहा कि उनकी बेटी इस फिल्म को बीच में छोड़कर आ गई और फिल्म देखकर रोने लगी। हालांकि, रंजीत रंजन को बाकी सांसदों का कोई खास समर्थन नहीं मिला, जो बेहद चिंता का विषय है। यह सर्वविदित है कि युवा वर्ग फिल्मों के किरदारों से प्रेरित होता है।
हिंसक फिल्में समाज के लिए ‘घातक’
यदि ऐसी हिंसक फिल्में, जिसमें मुख्य किरदार ही हिंसक गतिविधियों में शामिल है तो युवा वर्ग किस दिशा में जाएगा? कई साल पहले खलनायक नामक फिल्म आई थी। युवा खुद को खलनायक जैसा बनने पर उतारू हो गए थे। डर और अंजाम जैसी फिल्मों ने एकतरफा प्यार व बदला लेने की भावना को काफी बढ़ावा दिया। ओटीटी पर क्राइम के आइडिया परोसे जा रहे हैं। पुलिस को आए दिन ऐसे क्राइम के मामले मिलते हैं, जो ओटीटी की स्टोरी से प्रेरित होते हैं।
फिल्मों में रचनात्मक प्रयोग अवश्य होने चाहिए, लेकिन एनिमल जैसे प्रयोग से फिल्म जगत को बचना चाहिए। समाज को सामूहिक रूप से ऐसी फिल्मों का विरोध दर्ज कराना चाहिए। फिल्मों में हिंसा एक हद तक जायज ठहराई जा सकती है। यदि एनिमल जैसी फिल्में बनती रहीं तो समाज में ‘एनिमल’ जैसा व्यवहार करने वाले युवाओं को पनपने में देर नहीं लगेगी।
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