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पूर्व भारतीय सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे (फाइल)
– फोटो : ANI
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सेवानिवृत्त सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे का कार्यकाल चुनौतियों से भरा रहा। उन्होंने भारतीय सेना की क्षमता, पूर्वी लद्दाख की गलवां घाटी में चीनी सैनिकों- पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के साथ हुई हिंसक झड़प और देश में सेना के सबसे ऊंचे ओहदे- चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) का पद न मिलने जैसे कई कठिन सवालों पर बेबाकी से बयान दिया है। सेना प्रमुख ने सीडीएस का पद न मिलने के संबंध में कहा कि रक्षा और सैन्य मामलों में सरकार के विवेक और समझ पर सवाल खड़ा करना उन्हें मुनासिब नहीं लगता।
दरअसल, करीब साढ़े तीन साल पहले पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना और चीनी सैनिकों की हिंसक झड़प को गलवां घाटी हिंसा के नाम से भी जाना जाता है। चीन की पीएलए ने आक्रामकता दिखाते हुए भारत को उकसाने की हिमाकत की थी। भारत ने मुंहतोड़ जवाब दिया था। सेना के पराक्रम से जुड़ी इन घटनाओं पर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कहा, लद्दाख की घटना के बाद भारतीय सेना ने दुनिया को दिखाया कि अब बहुत हो चुका। उकसावे की कार्रवाई पर देश चुप नहीं बैठेगा। किसी भी नापाक मंसूबे का माकूल जवाब दिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि चीन ने सलामी स्लाइसिंग टैक्टिक्स (salami-slicing) अपनाकर कई देशों पर धौंस जमाई है। भारत के खिलाफ भी उसने यही नीति अपनाई, लेकिन भारतीय सेना ने दिखाया कि अब बहुत हो चुका। पड़ोसी देशों को कमजोर समझने की गलती भारी पड़ सकती है। दरअसल, इस नीति के तहत किसी कमजोर देश के भूभाग पर कब्जा करने के लिए छोटी-छोटी लड़ाइयां छेड़ी जाती है। इनका जवाब देना काफी जटिल होता है, क्योंकि किस स्तर की सैन्य कार्रवाई की जाए, यह समझना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।
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