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Russia Ukraine War News: यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू हुए दो साल से ज्यादा हो चुके हैं. यूक्रेन से आईं जंग की भयावह तस्वीरों ने पूरी दुनिया को झकझोरा है. बच्चे, बूढ़े, जवान… नागरिक हों या सैनिक, किसी ने धमाकों में अपना हाथ गंवा दिया तो किसी का पैर काटना पड़ा. फरवरी 2022 से लेकर अब तक लगभग 20 हजार यूक्रेनियों के अंग काटने पड़े हैं. ऐसी स्थिति में, प्रोस्थेटिक्स की डिमांड खासी बढ़ गई है और उसका इंतजार भी. यूक्रेन के कई इलाकों में तो प्रोस्थेटिक्स के लिए छह-छह महीने की वेटिंग लिस्ट है. अच्छे टेक्निशियंस की कमी ने मुश्किल और बढ़ा दी है. विकट परिस्थितियों में एक भारतीय उन यूक्रेनियों के लिए देवदूत बनकर आया है. नाम है नागेंद्र पराशर. पराशर के पूरे यूक्रेन में 10 प्रोस्थेटिक्स सेंटर्स हैं. उन्होंने एक प्रोस्थेटिक्स कंपोनेंट बनाने वाली फैक्ट्री भी डाल रखी है. उनके सेंटर्स पर मरीजों की भीड़ लगी है. पढ़िए, युद्ध की विभीषिका झेलने वाले यूक्रेनियों को फिर से उड़ने के लिए पंख दे रहे नागेंद्र पराशर के बारे में.
यूक्रेन के लोगों को अब बमों की आदत हो गई है. पराशर कहते हैं, ‘मैंने अपने घर के ऊपर ईरानी ड्रोन उड़ते देखे हैं. एयर सायरन घंटों बजते रहते हैं. रूस की मिसाइल स्ट्राइक कभी भी हो सकती है लेकिन यूक्रेनियों ने हिम्मत के साथ इन हालात में जीना सीख लिया है. यह उनके प्रतिरोध का हिस्सा है और दुनिया के लिए एक उदाहरण है.’
यूक्रेन के प्रोस्थेटिक्स सेंटर्स पर घायलों की कतार
1991 में यूक्रेन आए नागेंद्र पराशर यहीं के होकर रह गए. 2010 में उन्होंने प्रोस्थेटिक्स बनाने शुरू किए थे. उनके सेंटर्स पर प्रोस्थेटिस्ट कृत्रिम अंग डिजाइन करते और बनाते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में पराशर ने कहा, ‘मेरे प्रोस्थेटिक्स सेंटर्स पर इन दिनों इतनी भीड़ है कि मरीजों को संभालना मुश्किल हो गया है. प्रोस्थेटिस्ट्स को ओवरटाइम करना पड़ रहा है क्योंकि घायल सैनिकों की संख्या बढ़ती जा रही है और युद्ध के चलते मैनपावर की कमी है.’
मुश्किल हालात में चुनौतियां भी कम नहीं
पराशर और उनकी टीम के लिए सबसे बड़ी चुनौती वक्त की कमी है. उन्होंने कहा, ‘अच्छे कृत्रिम अंग बनाने में समय लगता है और यूक्रेन आज जिन दिक्कतों का सामना कर रहा है, उसे देखते हुए चीजें जटिल होती जा रही हैं. एम्पुटीज में स्टंप का साइज घटता जाता है, इसलिए हमारे सेंटर्स पर रिपीट पेंशेंट्स नॉर्मल हैं. लेकिन पहली बार आ रहे मरीज भी बढ़ने से पूरा सिस्टम जाम हो रहा है.’ पराशर ने कहा, ‘छोटे बच्चों के केस खासतौर पर बड़े मुश्किल होते हैं क्योंकि उनके स्टंप का साइज तेजी से बदलता है.’

पराशर के मुताबिक, ‘एक सैनिक, जिसे मेरा प्रोस्थेसिस मिला था, एक मिशन के बाद मुझे थैंक्यू बोलने आया. वह टोही मिशन पर निकला था और उसने एक बूबी-ट्रैप लैंडमाइन पर कदम रख दिया. लेकिन किसी तरह उसके प्रोस्थेटिक पैर के नीचे लगे स्क्रू ने जाल के तार को ट्रिप होने से रोक दिया.’
जापानी तकनीक से बढ़ेगी प्रोडक्टिविटी
पराशर बताते हैं कि वह यूक्रेन में हाई क्वालिटी प्रोस्थेसिस बना रहे हैं. इसमें सबसे मुश्किल काम उन प्रोस्थेसिस सॉकेट्स को बनाना होता है जो मरीज के स्टंप में फिट होते हैं. इसमें कुछ दिन लग जाते हैं. हाल ही में पराशर ने यूक्रेन पीएम डेनिस श्यामल के साथ जापान का दौरा किया. वहां से ऐसी तकनीक लाए हैं जिससे वह 3D प्रिंटर्स की मदद से प्रोस्थेसिस सॉकेट्स को स्कैन और बना पाएंगे. इसके बाद AI की मदद से प्रेशर प्वॉइंट्स मैप करेंगे ताकि कृत्रिम अंग आरामदायक रहे.

भारत का भी फायदा
पराशर जल्द ही फरीदाबाद में भी प्रोस्थेटिक्स फैक्ट्री लगाने जा रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘यूक्रेन में हम जिस क्वालिटी में प्रोस्थेसिस बना रहे हैं, वह भारत में उपलब्ध नहीं है. इसलिए मैंने यहां पर लोगों को हाई क्वालिटी प्रोस्थेसिस बनाने की ट्रेनिंग देना शुरू किया है, इसके लिए मैं अमेरिका से मशीनें भी मंगवा रहा हूं.’ पराशर के मुताबिक, ‘अभी इंपोर्ट किए गए हाई क्वालिटी प्रोस्थेसिस को एडजस्टमेंट के लिए वापस बनाने वाले देश को भेजना पड़ता है, जिसमें तीन महीने तक लग सकते हैं. लेकिन मेरा मिशन है कि वही हाई क्वालिटी प्रोस्थेसिस भारत में बनें और मेंटेनेंस टाइम बस कुछ दिन का रह जाए.
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