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सुप्रीम कोर्ट
– फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने शरीयत कानून, 1937 की वैधता को चुनौती देने वाली और आईपीसी की धारा 494 (बहुविवाह के लिए सजा) को शून्य करने की मांग से संबंधित इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष लंबित जनहित याचिका को अपने पास स्थानांतरित कर लिया।
पिछले साल मार्च में हाईकोर्ट की एक पीठ ने हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड की दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अटॉर्नी जनरल को नोटिस जारी किया था। हालांकि, केंद्र ने इस आधार पर याचिका को स्थानांतरित करने की मांग की थी कि संविधान पीठ के मामले (अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ) में समान मुद्दे विचाराधीन हैं।
सोमवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ को बताया गया कि नोटिस जारी होने के बावजूद प्रतिवादी उपस्थित नहीं हुआ। यह देखते हुए कि उठाए गए मुद्दे मोटे तौर पर संविधान पीठ के समक्ष विचाराधीन हैं, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल याचिका को अपने पास स्थानांतरित कर दिया और इसे लंबित मामले के साथ जोड़ दिया।
संविधान पीठ पहले से कर रही कुछ याचिकाओं पर सुनवाई
पीठ ने कहा कि ऐसा लगता है कि उपर्युक्त रिट याचिका में हाईकोर्ट के समक्ष जो मुद्दे उठाए गए हैं वे मोटे तौर पर 2018 की दायर एक रिट याचिका में शामिल है, जो संविधान पीठ के समक्ष विचाराधीन हैं। लिहाजा हम रिट याचिका को इस न्यायालय में स्थानांतरित करना उचित समझते हैं और 2018 की रिट याचिका के साथ जोड़ देते हैं। बहुविवाह और निकाह हलाला की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं का एक समूह सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष लंबित है। 2018 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ ने इन याचिकाओं को पांच जजों की पीठ को भेजा था।
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