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चौधरी चरण सिंह, कांशीराम और मायावती।
– फोटो : अमर उजाला
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आजादी से पहले और बाद भी, राजनीतिक दृष्टिकोण से पश्चिम उत्तर प्रदेश देश में हमेशा सुर्खियों में रहा। यहां से राजनीति का ककहरा पढ़कर कई दिग्गजों ने इतिहास रच दिया तो अनेकों सूरमाओं ने मात भी खाई। भारत रत्न चौधरी चरण सिंह मुजफ्फरनगर से पहला चुनाव हार गए। बसपा अध्यक्ष मायावती कैराना, बसपा संस्थापक कांशीराम सहारनपुर और अजित सिंह बागपत में ही मतदाताओं की नब्ज पकड़ने में चूक गए थे। साल 1977 में मेरठ में कैलाश प्रकाश ने तत्कालीन सांसद शाहनवाज खान को चित कर दिया था। वर्ष 1980 और 1984 में मोहसिना किदवई ने लगातार दो चुनाव मेरठ से जीते, लेकिन इसके बाद जनता दल से हरीश पाल ने 1989 में मोहसिना किदवई को हरा दिया। मेरठ के मुकाबले दिलचस्प रहे। प्रस्तुत है चुनाव डेस्क की रिपोर्ट।
मेरठ लोकसभा सीट
बाहरी प्रत्याशियों के लिए खोला दिल
मेरठ को पश्चिम उप्र की राजनीति का केंद्र कहा जाता है। 1952 के लोकसभा चुनाव में मेरठ को तीन लोकसभा सीटों में बांटा हुआ था। 1957 में तीनों सीटों को मिलाकर एक सीट मेरठ लोकसभा बनाई गई। इसके बाद से 2019 तक 17 बार मेरठ लोकसभा सीट पर चुनाव हुआ है। 2024 में 18वीं बार लोकसभा सदस्य का चुनाव होगा।
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