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Deputy SP Shailendra Singh
– फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
मुलायम सिंह यादव की अल्पमत की सरकार किसी भी कीमत पर मुख्तार अंसारी को बचाना चाहती थी। मेरे ऊपर मुख्तार पर दर्ज मुकदमे से पोटा हटाने का दबाव था। मैंने इंकार किया तो आईजी जोन, डीआईजी रेंज और एसटीएफ के एसएसपी का तबादला कर दिया। इतना दबाव डाला गया कि अच्छी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया गया। बाहर आने पर कहीं नौकरी नहीं करने दी। कोई किराए का मकान तक नहीं देता था। यह दास्तां है एसटीएफ की वाराणसी यूनिट के पूर्व डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह का, जिन्होंने मुख्तार को लाइट मशीन गन बेचने आए तीन बदमाशों को गिरफ्तार किया था। उनकी इस बहादुरी का इनाम देने के बजाय सरकार खुलकर मुख्तार के समर्थन में आ गयी थी।
माफिया मुख्तार अंसारी की बांदा जेल में मौत के बाद शैलेंद्र सिंह ने कहा कि उस दौरान मुख्तार का भय चरम पर था। उसे सरकार का खुला समर्थन हासिल था। मऊ दंगे में हथियार लेकर घूमने पर किसी की विरोध या कार्रवाई करने की हिम्मत तक नहीं हुई। मैंने यूपी में पहली बार एलएमजी बरामद कराई थी। मुख्तार को जेल भेजने के लिए पोटा लगाया था, जो उस दौर का सबसे सख्त कानून था। हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मुख्तार को किसी भी कीमत पर बचाना चाहते थे।
अत्यधिक दबाव में मजबूरीवश मुझे इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि मैंने अपनी बात जनता को बताई कि किस तरह आपकी चुनी हुई सरकार माफिया के निर्देश पर काम कर रही है। मैंने अपनी टीम के साथ एलएमजी बरामद की थी। मेरी ड्यूटी थी कि जनता के लिए कहर बनने वाले ऐसे तत्वों को रोका जाए। वहीं मुख्तार की मौत को लेकर उठ रहे सवालों पर शैलेंद्र ने कहा कि जेल में किसी को जहर देना आसान नहीं होता है। कोई भी अधिकारी अपनी नौकरी को फंसाना नहीं चाहेगा। यदि यह मामला अदालत में जाता है तो मुख्तार के परिजनों को कोई राहत नहीं मिलेगी।
अपनी और परिवार की जान जोखिम में डाली
शैलेंद्र ने कहा कि जब हम नौकरी में आते हैं तो पब्लिक सर्वेंट बोला जाता है। बाद में पार्टी के एजेंट बन जाते हैं और उनके मुताबिक फैसले लेने लगते हैं। पुरानी कहावत है कि यदि पुलिस चाह ले तो पत्ता भी नहीं खड़क सकता है। मैंने स्टैंड लेकर अपनी और अपने परिवार की जान को जोखिम में डाला था। हर आदमी का अच्छा-बुरा कर्म देर-सवेर सामने आता है। ऐसा ही हाल मुख्तार अंसारी का भी हुआ है। पहले मुख्तार के खिलाफ दर्ज मामलों में दो दशक तक फैसला नहीं आता था, हालात बदले तो डेढ़ साल में कई बार सजा हो गयी।
कृष्णानंद राय की हत्या में होनी थी इस्तेमाल
वर्ष 2004 में मुख्तार पर सेना से चोरी हुई मशीन गन (एलएमजी) खरीदने का आरोप लगा था, जिसने सूबे की सियासत में हड़कंप मचा दिया था। शैलेंद्र सिंह और उनकी टीम ने 5 जनवरी 2004 को वाराणसी के चौबेपुर इलाके में छापा मारकर मुख्तार को एलएमजी बेचने आए बाबूलाल यादव और मुन्नर यादव को गिरफ्तार किया था। उनके पास से एलएमजी और दो सौ कारतूस बरामद हुए थे। पूछताछ के बाद खुलासा हुआ था कि वह मुख्तार को एक करोड़ रुपये में एलएमजी बेचने वाराणसी आए थे। इसका इस्तेमाल भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के लिए होना था।
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