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संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय
– फोटो : एएनआई
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पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की युवतियों और लड़कियों की सुरक्षा में लगातार कमी पर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के विशेषज्ञों ने नाराजगी जाहिर की। विशेषज्ञों ने कहा कि देश को अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत अपने दायित्वों का पालन करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ईसाई और हिंदू समुदाय की लड़कियां खासतौर पर जबरन धर्मांतरण, अपहरण, तस्करी, बाल विवाह, जल्दी और जबरन शादी, घरेलू दासता और यौन हिंसा से पीड़ित हैं।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के उच्चायुक्त के कार्यालय ने विशेषज्ञों के हवाले से एक बयान जारी किया। इसमें कहा गया, धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं और लड़कियों के साथ इस तरह के जघन्य मानवाधाकार उल्लंघनों और ऐसे अपराधों को अब बर्दाश्त नहीं किया किया जा सकता है। इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने इस बात भी चिंता जताई कि धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों के जबरन विवाह और धर्मांतरण को अदालतों द्वारा मान्य किया जाता है। अक्सर पीड़ितो को उनके माता-पिता को वापस करने की अनुमति देने के बजाय उन्हें अपहरणकर्ताओं के साथ रहने को उचित ठहराने के लिए धार्मिक कानून का सहारा लिया जाता है। उन्होंने कहा कि अपराधी जवाबदेही से बच जाते हैं। पुलिस प्रेम विवाह (लव मैरिज) की आड़ में अपराधों को खारिज कर देती है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि बाल विवाह, जल्दी और जबरन शादी को धार्मिक या सांस्कृतिक आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अगर पीड़िता की उम्र 18 साल से कम हो तो सहमति अप्रसांगिक है। विशेषज्ञों ने कहा, एक महिला का जीवनसाथी चुनने और स्वतंत्र रूप से विवाह करने का अधिकार उसके जीवन, गरिमा और समानता के लिए इंसान के रूप में बेहद जरूरी है और इसे कानून द्वारा बरकरार रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, पीड़ितों के लिए न्याय, उपाय, संरक्षण और जरूरी मदद तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए जबरन विवाह को अमान्य करने, रद्द करने या भंग करने के प्रावधानों की जरूरत है।
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