[ad_1]
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- रोष, जिसका अर्थ है- कोप , क्रोध , गुस्सा, चित्त का वह उग्र भाव जो कष्ट या हानि पहुँचाने वाले अथवा अनुचित काम करने वाले के प्रति होता है। प्रस्तुत है रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविता- मोहिनी, यह कैसा आह्वान?
(1)
समय-असमय का तनिक न ध्यान
मोहिनी, यह कैसा आह्वान?
पहन मुक्ता के युग अवतंस,
रत्न-गुंफित खोले कच-जाल,
बजाती मधुर चरण-मंजीर,
आ गई नभ में रजनी-बाल।
झींगुरों में सुन शिंजन-नाद
मिलन-आकुलता से द्युतिमान,
भेद प्राची का कज्जल-भाल,
बढ़ा ऊपर विधु वेपथुमान।
गया दिन धूलि-धूम के बीच
तुम्हारा करते जयजयकार,
देखने आया था इस साँझ,
पूर्ण विधु का मादक शृंगार।
एक पल सुधा-वृष्टि के बीच
जुड़ा पाये न क्लांत मन-प्राण,
कि सहसा गूँज उठा सब ओर
तुम्हारा चिर-परिचित आह्वान।
(2)
यह कैसा आह्वान!
समय-असमय का तनिक न ध्यान।
झुकी जातीं पलकें निस्पंद
दिवस के श्रम का लेकर भार,
रहे द्रग में क्रम-क्रम से खेल
नए, भोले, लघु स्वप्न-कुमार।
रक्त-कर्दम में दिन भर फूँक
रजत-शृंगी से भैरव-नाद,
अभी लगता है कितना मधुर
चाँदनी का सुनना संवाद!
दग्ध करती दिनभर सब अंग
तुम्हारे मरु की जलती धूल;
निशा में ही खिल पाते देवि!
कल्पना के उंमादक फूल।
अन्य अनुचर सोए निश्चिंत
शिथिल परियों को करते प्यार;
रात में भी मुझ पर ही पड़ा
द्वार-प्रहरी का गुरुतम भार।
सुलाने आई गृह-गृह डोल,
नींद का सौरभ लिए बतास;
हुए खग नीड़ों में निस्पंद,
नहीं तब भी मुझको अवकाश!
ऊँघती इन कवियों को सौंप
कल्पना के मोहक सामान;
पुनः चलना होगा क्या हाय,
तुम्हारा सुन निष्ठुर आह्वान?
आगे पढ़ें
5 घंटे पहले
[ad_2]
Source link