Home Breaking News आज का शब्द: रोष और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता- मोहिनी, यह कैसा आह्वान?

आज का शब्द: रोष और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता- मोहिनी, यह कैसा आह्वान?

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आज का शब्द: रोष और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता- मोहिनी, यह कैसा आह्वान?

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                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- रोष, जिसका अर्थ है- कोप , क्रोध , गुस्सा, चित्त का वह उग्र भाव जो कष्ट या हानि पहुँचाने वाले अथवा अनुचित काम करने वाले के प्रति होता है। प्रस्तुत है रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविता- मोहिनी, यह कैसा आह्वान?
                                                                 
                            

(1) 

समय-असमय का तनिक न ध्यान 
मोहिनी, यह कैसा आह्वान? 
पहन मुक्ता के युग अवतंस, 
रत्न-गुंफित खोले कच-जाल, 
बजाती मधुर चरण-मंजीर, 
आ गई नभ में रजनी-बाल। 

झींगुरों में सुन शिंजन-नाद 
मिलन-आकुलता से द्युतिमान, 
भेद प्राची का कज्जल-भाल, 
बढ़ा ऊपर विधु वेपथुमान। 

गया दिन धूलि-धूम के बीच 
तुम्हारा करते जयजयकार, 
देखने आया था इस साँझ, 
पूर्ण विधु का मादक शृंगार। 

एक पल सुधा-वृष्टि के बीच 
जुड़ा पाये न क्लांत मन-प्राण, 
कि सहसा गूँज उठा सब ओर 
तुम्हारा चिर-परिचित आह्वान। 

(2) 

यह कैसा आह्वान! 
समय-असमय का तनिक न ध्यान। 
झुकी जातीं पलकें निस्पंद 
दिवस के श्रम का लेकर भार, 
रहे द्रग में क्रम-क्रम से खेल 
नए, भोले, लघु स्वप्न-कुमार। 

रक्त-कर्दम में दिन भर फूँक 
रजत-शृंगी से भैरव-नाद, 
अभी लगता है कितना मधुर 
चाँदनी का सुनना संवाद! 

दग्ध करती दिनभर सब अंग 
तुम्हारे मरु की जलती धूल; 
निशा में ही खिल पाते देवि! 
कल्पना के उंमादक फूल। 

अन्य अनुचर सोए निश्चिंत 
शिथिल परियों को करते प्यार; 
रात में भी मुझ पर ही पड़ा 
द्वार-प्रहरी का गुरुतम भार। 

सुलाने आई गृह-गृह डोल, 
नींद का सौरभ लिए बतास; 
हुए खग नीड़ों में निस्पंद, 
नहीं तब भी मुझको अवकाश! 

ऊँघती इन कवियों को सौंप 
कल्पना के मोहक सामान; 
पुनः चलना होगा क्या हाय, 
तुम्हारा सुन निष्ठुर आह्वान? 

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5 घंटे पहले

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