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Indian Army
– फोटो : Amar Ujala
विस्तार
जम्मू कश्मीर में पुंछ के सुरनकोट में आतंकियों ने वायु सेना के वाहन पर घात लगाकर जो हमला किया है, उसमें स्टील की गोलियों का इस्तेमाल हुआ है। ये गोलियां, अमेरिका निर्मित M4 कार्बाइन असाल्ट राइफल और एके-56 राइफल के द्वारा दागी गई हैं। सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े सूत्रों ने बताया, गत वर्ष भी पुंछ में भारतीय सेना के वाहन पर हमला करने के लिए पाकिस्तान के आतंकी संगठन ‘जैश-ए-मोहम्मद’ की जम्मू-कश्मीर में सक्रिय प्रॉक्सी विंग ‘पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट’ (पीएएफएफ) ने चीन में निर्मित स्टील की गोलियों का इस्तेमाल किया था। आतंकियों द्वारा इस्तेमाल की जा रही स्टील की गोलियां यानी ‘आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी’ (एपीआई) का निर्माण चीन में हो रहा है। स्टील की गोली का वार झेलने की क्षमता ‘लेवल-4’ बुलेट प्रूफ कवच में होती है। भारतीय सुरक्षा बलों के ज्यादातर बुलेटप्रूफ वाहन, मोर्चा, जैकेट और पटका, ‘लेवल 3’ श्रेणी के होते हैं।
2017 में पुलवामा के लेथपोरा स्थित सीआरपीएफ कैंप पर हुए हमले में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने ‘आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी’ का पहली बार इस्तेमाल हुआ था। आर्मी या किसी अन्य फोर्स में ‘आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी’ का इस्तेमाल, गैर-कानूनी है। यहां तक कि ‘नाटो’ ने भी स्टील की गोलियों पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। चीन और पाकिस्तान में ये गोलियां प्रयोग में लाई जाती हैं। पिछले साल पुंछ में हुए जिस आतंकी हमले में सेना के पांच जवान शहीद हुए थे, वहां भी आतंकियों ने इन्हीं गोलियों का इस्तेमाल किया था। 7.62 एमएम स्टील कोर की गोलियां चीन में निर्मित हैं। वहां से इन गोलियों को पाकिस्तान में लाया जाता है। उसके बाद वहां के सक्रिय आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा, आईएसआई की मदद से स्टील की गोलियों को सीमा पार भेजने का प्रयास करते हैं। आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी की मारक क्षमता तीन सौ मीटर तक बताई जाती है।
आतंकी समूह इसका इस्तेमाल नजदीक की लड़ाई में करते हैं। महज कुछ मीटर दूरी से एके-47 या इसी सीरिज की किसी दूसरी राइफल से इसका फायर किया जाता है। जब ‘लेवल 3’ वाले बुलेटप्रूफ वाहन, मोर्चा, जैकेट और पटका आदि पर ये गोलियां दागी जाती हैं, तो वे आर-पार चली जाती हैं। उसे किसी वाहन, मोर्चा या बुलेटप्रूफ जैकेट पहने व्यक्ति पर चलाते हैं, तो वह उसे भेदते हुए दूसरे सिरे से बाहर निकल जाती हैं। मौजूदा समय में हर जगह पर ‘लेवल-4’ बुलेटप्रूफ कवच नहीं है। इस कवच को केवल चुनींदा ऑपरेशन में ही इस्तेमाल किया जाता है। 2017 में लेथपोरा स्थित सीआरपीएफ कैंप पर हुए हमले में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने इन्हीं गोलियों का इस्तेमाल कर सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया था। कई जवानों, जिन्होंने बुलेटप्रूफ जैकेट पहन रखी थी, उसे ‘आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी’ ने भेद दिया था। इसके अलावा वहां लगे मोर्चे भी उसकी मार को नहीं झेल सके थे।
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