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'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अनत, जिसका अर्थ है- बिना झुका हुआ, सीधा, दूसरी जगह। प्रस्तुत है सूरदास की रचना- जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी
मेरो मन अनत कहां सुख पावै
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै
कमलनैन कौ छांड़ि महातम और देव को ध्यावै
परमगंग कों छांड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावै
जिन मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यों करील-फल खावै
सूरदास, प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै
भावार्थ:- यहां भक्त की भगवान् के प्रति अनन्यता की ऊंची अवस्था दिखाई गई है। जीवात्मा परमात्मा की अंश-स्वरूपा है। उसका विश्रान्ति-स्थल परमात्मा ही है, अन्यत्र उसे सच्ची सुख-शान्ति मिलने की नहीं। प्रभु को छोड़कर जो इधर-उधर सुख खोजता है, वह मूढ़ है। कमल-रसास्वादी भ्रमर भला करील का कड़वा फल चखेगा ? कामधेनु छोड़कर बकरी को कौन मूर्ख दुहेगा ? गंगा के सानिध्य में भी रहकर मतिमंद ही होगा जो कुआं खुदवाएगा। मेरा मन अन्यत्र कहाँ सुख पाए ? जैसे विशाल जलराशि वाले सागर के जहाज पर बैठा पंछी उड़कर कहीं भी जाए चारो तर पानी ही पानी पाकर फिर जहाज पर आकर बैठ जाता है।
11 घंटे पहले
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