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India-Pakistan Relations: लाहौर समझौते पर नवाज का ‘कबूलनामा’ क्यों है भारत-पाक रिश्तों के लिए अहम?

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India-Pakistan Relations: लाहौर समझौते पर नवाज का ‘कबूलनामा’ क्यों है भारत-पाक रिश्तों के लिए अहम?

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India-Pakistan: पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने 28 मई को स्वीकार किया कि इस्लामाबाद ने भारत के साथ 1999 में हुए लाहौर समझौते का ‘उल्लंघन’ किया है. उन्होंने जनरल परवेज मुशर्रफ द्वारा करगिल में किए गए हमले के स्पष्ट संदर्भ में यह बात कही.

पीटीआई-भाषा के मुताबिक नवाज ने कहा,  ‘28 मई 1998 को पाकिस्तान ने पांच परमाणु परीक्षण किये. उसके बाद वाजपेयी साहब यहां आए और हमारे साथ समझौता किया. लेकिन, हमने उस समझौते का उल्लंघन किया…यह हमारी गलती थी.’

सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) का अध्यक्ष चुने जाने के बाद पार्टी की आम परिषद को संबोधित करते हुए शरीफ ने यह बयान दिया.

नवाज का बयान बेहद महत्वपूर्ण
जानकारों का मानना है कि नवाज शरीफ का यह बयान बहुत महत्वपूर्ण है. इस बयान  की अहमियत इस तथ्य से भी बढ़ जाती है कि भारत में इस वक्त आम चुनाव हो रहे हैं. नवाजी की टिप्पणी भारत के लोकसभा चुनाव के नतीजों (4 जून) से कुछ से समय पहले ही आई है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त अजय बिसारिया ने कहा, ‘इसे भारत की आने वाली सरकार के लिए पाकिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण सिविलियन लीडर की ओर से एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए.’

मोदी-शरीफ के बीच बेहतर संबंध
रिपोर्ट के मुताबिक शरीफ के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अच्छे संबंध हैं और 2015 में उनके कार्यकाल में ही दोनों देशों के बीच अंतिम बार ठोस द्विपक्षीय वार्ता हुई थी. हालांकि जम्मू-कश्मीर और आतंकवाद सहित सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए उन्होंने जो व्यापक वार्ता शुरू की थी, वह 2016 के पठानकोट आतंकवादी हमले के कारण जल्द समाप्त हो गई थी.

शरीफ बंधु (नवाज के भाई शहबाज वर्तमान प्रधानमंत्री हैं) उम्मीद कर सकते हैं कि अगर मोदी सरकार अगले हफ्ते वापस आती है तो वे संबंधों में गतिरोध को तोड़ देंगे. हालांकि भारत के लिए उस स्थिति में पहला कदम उठाने की जिम्मेदारी पूरी तरह से इस्लामाबाद पर ही रहेगी, क्योंकि यह पाकिस्तान ही था जिसने 2019 में भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा रद्द करने के बाद अपने उच्चायुक्त को वापस बुलाया था और व्यापार संबंधों को समाप्त कर दिया था..

मार्च में पाक ने दिए थे रिश्ते सुधारने के संकेत
मार्च में पाकिस्तान की ओर से कुछ प्रगति के संकेत मिले थे, जब विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा था कि इस्लामाबाद भारत के साथ व्यापार संबंधों को बहाल करने पर विचार करेगा. यह बात फिर से स्पष्ट हो गई कि पाकिस्तान भारत के साथ संबंधों को लेकर दुविधा में है, जब उनके अपने मंत्रालय ने तुरंत स्पष्ट किया कि उसके रुख में कोई बदलाव नहीं आया है.

पाकिस्तान का आधिकारिक रुख
पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर कहता रहा है कि बातचीत तभी संभव है जब भारत कश्मीर में अपने कदमों को वापस ले.

कोई भी भारतीय सरकार, निश्चित रूप से पाकिस्तान की ऐसी किसी भी मांग को स्वीकार नहीं करेगी, सिवाय इसके कि वह राज्य का दर्जा जल्द से जल्द वापस करने की दिशा में काम करे, जैसा कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, इस फैसले में तत्कालीन राज्य के विशेष दर्जे को रद्द करने को बरकरार रखा गया था.

पाकिस्तान का मानना ​​है कि राज्य का दर्जा बरकरार रखा जाना चाहिए और चुनाव कश्मीरियों के ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ का विकल्प नहीं हो सकते. अगर मोदी सरकार वापस आती है तो आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का सहारा लिए बिना इस मुद्दे पर कोई लचीलापन दिखाता है या नहीं.

क्या था लाहौर घोषणापत्र
लाहौर घोषणापत्र भारत और पाकिस्तान के बीच एक द्विपक्षीय समझौता और शासन संधि थी. इस संधि पर 21 फरवरी 1999 को लाहौर में एक ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन के समापन पर हस्ताक्षर किए गए थे और उसी वर्ष दोनों देशों की संसदों द्वारा इसकी पुष्टि की गई थी.

इस समझौते की विषय वस्तु में दोनों सरकारों ने शांति, स्थिरता, आपसी प्रगति के दृष्टिकोण, शिमला समझौते और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रति अपनी पूर्ण प्रतिबद्धता पर जोर दिया.

इस समझौते के तहते भारत-पाकिस्तान इन 7 पवाइंट्स पर राजी हो गए: –

1-जम्मू-कश्मीर सहित सभी मुद्दों को सुलझाने के लिए अपने प्रयास तेज करेंगे.

2-एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और दखलंदाजी से बचना होगा.

3-सहमत द्विपक्षीय एजेंडे के शीघ्र और सकारात्मक परिणाम के लिए अपनी समग्र और एकीकृत वार्ता प्रक्रिया को तेज करेंगे.

4-परमाणु हथियारों के आकस्मिक या अनधिकृत उपयोग के जोखिम को कम करने के लिए तत्काल कदम उठाएंगे और संघर्ष की रोकथाम के उद्देश्य से परमाणु और पारंपरिक क्षेत्रों में विश्वास निर्माण के उपायों को विस्तृत करने के उद्देश्य से अवधारणाओं और सिद्धांतों पर चर्चा करेंगे.

5-दोनों देश सार्क के लक्ष्यों और उद्देश्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हैं. वर्ष 2000 और उसके बाद के लिए सार्क के दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में अपने प्रयासों को समन्वित करने का संकल्प लेते हैं, जिसका उद्देश्य दक्षिण एशिया के लोगों के कल्याण को बढ़ावा देना और त्वरित आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक विकास के माध्यम से उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है.

6-आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों की निंदा करते हैं और इस खतरे से लड़ने के अपने दृढ़ संकल्प की पुष्टि करते हैं.

7-सभी मानव अधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं को बढ़ावा देगा और उनकी रक्षा करेगा.

इस समझौते पर पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ और तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

दो महीने बाद ही हो गया कारगिल युद्ध
मई 1999 में कारगिल युद्ध छिड़ने के बाद दोनों देशों के बीच संबंध पूरी तरह बदल गए, जब अचानक पता चला कि पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीर में घुसपैठ की है. भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना के सैनिकों को बाहर निकालने और विवादित क्षेत्र पर फिर से कब्ज़ा करने के लिए तैनात किया गया. दो महीने तक चले संघर्ष में दोनों पक्षों के सैकड़ों सैनिकों की जान चली गई और दोनों देश पूर्ण पैमाने पर युद्ध और संभावित परमाणु संघर्ष के करीब पहुंच गए. इस संघर्ष के बाद, ‘लाहौर संधि’ स्थगित हो गई और फरवरी 1999 में लाहौर में शुरू की गई बातचीत को बढ़ावा देने पर दोनों देशों के बीच कोई और चर्चा नहीं हुई.

वहीं पाकिस्तान में राजनीतिक तस्वीर तेजी से बदल गई. सेना और न्यायपालिका के साथ कई महीनों के विवादास्पद संबंधों के बाद, पाकिस्तान सशस्त्र बलों द्वारा एक सैन्य तख्तापलट किया गया, जिसने नवाज शरीफ की सरकार को उखाड़ फेंका. चेयरमैन ज्वाइंट चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ देश के मुखिया बन गए,  जिन्हें कारगिल घुसपैठ के लिए जिम्मेदार माना गया था.

(Photo-Facebook)

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