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Russia-NATO War: लाखों करोड़ों जिंदगियों को खत्म करने वाला, अनगिनत लोगों को मौत से भी बदतर जिंदगी जीने के लिए मजबूर करने वाला महायुद्ध ऐसे ही शुरू नहीं हो जाता. महाशक्तियां ऐसे महायुद्धों के बीज बोती हैं फिर युद्ध के मैदान में अपने फायदे की फसल काटती हैं.
कई बार युद्ध जरूरी होता है तो कई बार मजबूरी. अब इसे जरूरी कहें या मजबूरी दुनिया के सबसे ताकतवर सैन्य संगठन ने तीसरे विश्वयुद्ध के बीज बोने शुरू कर दिए हैं और जिस तरह महायुद्ध के बीजों को बारूदी खाद पानी मिल रहा है.
NATO की सेनाएं कर रहीं युद्धाभ्यास
दुनिया को तबाह करने वाले युद्ध की फसल इस साल के अंत से पहले ही काटी जा सकती है. तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं पर आधारित हमारी खास वेब सीरीज़ के पहले चैप्टर में हम आपको बताएंगे किस तरह पिछले 6 महीनों से नेटो की सेनाएं रूस को घेरकर फाइनल वॉर की प्रैक्टिस कर रही हैं और क्या है मास्को पर सिर्फ 9 घंटे पर कब्जे का नेटो प्लान.
दूसरे चैप्टर में हम आपको नेटो के उन बाहुबली हथियारों के बारे में बताएंगे,जिनके जरिए अमेरिकी और नेटो सेनाएं रूस से आखिरी युद्ध करने की तैयारी कर चुकी हैं.
तीसरे चैप्टर में हम आपको बताएंगे मौत के इस खेल की तैयारी में कौन कितना आगे है और दुनिया में मची हथियारों की होड़ में किस देश ने तबाही का कितना सामान इकट्ठा किया.
वेब सीरीज़ के चौथे चैप्टर में हम आपको बताएंगे नेटो की महायुद्ध वाली तैयारी का जवाब देने के लिए पुतिन ने कौन सा प्लान बनाया है. और नेटो की महासेना खिलाफ उनका मददगार कौन है.
बेलारूस में हैं रूस के टैक्टिकल हथियार
नेटो में शामिल देश लिथुआनिया बेलारूस से सटा देश है. यानी जहां पर रूस ने अपने टैक्टिकल परमाणु हथियार तैनात किए हैं उस देश के बेहद पास जर्मनी के खतरनाक कमांडोज़ और बैटल ग्रुप युद्धाभ्यास कर रहे हैं.
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार जर्मनी के 4600 से ज्यादा सैनिक अपने देश के बाहर लंबे वक्त के लिए तैनात हुए हैं. लिथुआनिया जिसका बॉर्डर रूस के केलिनिनग्राद इलाके से सटा है वहां पर बाल्टिक देश ने जर्मन ब्रिगेड के लिए एक बेस तैयार किया है. रूस से किसी भी तरह के युद्ध की स्थिति में जर्मनी की सेनाएं रूसी इलाकों पर टूट पड़ेंगी.
लेकिन ये सिर्फ नेटो की तैयारियों की झांकी है क्योंकि पिछले 5 महीनों से नेटो सेनाएं रूस के चारों तरफ युद्धाभ्यास की सबसे बड़ी सीरीज़ चला रही हैं, जिनका मकसद बारूदी है.
दो-दो हाथ करने का बना लिया मन?
जब अस्तित्व पर संकट आता है तो महाशक्तियां वो फैसला करती हैं जिनका परिणाम सिर्फ तबाही होती है. इस वक्त दुनिया का सबसे शक्तिशाली सैन्य संगठन नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी आर्गनाइजेशन यानि नेटो है. और रूस की परमाणु धमकियों के बाद नेटो ने 32 देशों पर सबसे बड़े खतरे यानि रूस से दो दो हाथ करने का मन बना लिया है. पिछले 5 महीने से नेटो इस महायुद्ध के लिए बड़ा अभ्यास कर रहा है.
रूस को चारों तरफ से घेरने की तैयारी कर ली गई है और छठे महीने में यूरोप से तबाही की वो बारूदी आंधी उठने वाली है जो या तो रूस को या तो पूरे यूरोप को ख़त्म कर देगी.
पुतिन की परमाणु एक्सरसाइज़ सारी दुनिया ने देखी. लेकिन दुनिया का ध्यान उन युद्धाभ्यासों पर नहीं गया, जो 2024 की जनवरी से नेटो देशों की सेनाएं रूस को घेर कर लगातार कर रही हैं. ये युद्धाभ्यास रूस से सटे उन देशों में भी हुए जिन पर रूस के हमले का सबसे ज्यादा खतरा है तो यहां से नेटो की सेनाएं भी सीधे रूस पर हमला कर सकती हैं.
जमीन, पानी और आसमान से घेरने की तैयारी!
समंदर से रूस पर हमले का अभ्यास कर लिया गया है. आसमान से रूस पर हमले का अभ्यास पूरा हो चुका है.और ज़मीन पर भी रूसी सेनाओं से टकराने की तैयारी नेटो की सेनाएं कर चुकी हैं.माना जा रहा है इस संभावित युद्ध को देखने के बाद दुनिया अब तक हुए सारे युद्ध भूल जाएगी.
रूस की आक्रामकता के खिलाफ नेटो देश शीत युद्ध के बाद की सबसे बड़ी वॉर एक्सरसाइज़ Steadfast Defender 24 कर रहे हैं. अमेरिका और यूरोपीय देशों ने इतने आधुनिक हथियारों के साथ जमीन, आसमान और समंदर में कई दशकों के बाद इतनी लंबी वॉर एक्सरसाइज़ की है, जिसमें रूस के खिलाफ युद्ध की एक एक रणनीति पर काम किया गया है तो क्या नेटो ने रूस पर सीधे हमले की तैयारी कर ली है.
इस साल की शुरुआत में अमेरिका और कनाडा ने किसी भी युद्ध की स्थिति में आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक से तेजी के साथ यूरोप में तैनाती की प्रैक्टिस कर ली है. इस इलाके में रूस का सबमरीन नेटो सेनाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं इसलिए उनसे निपटने का भी अभ्यास हुआ है.
इन इलाकों में मजबूती का मतलब है रूस, पुर्तगाल, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों को समंदर से नुकसान नहीं पहुंचा पाएगा.
वॉर एक्सरसाइज में 50 से ज्यादा युद्धपोत गरजे
वॉर एक्सरसाइज़ में 50 से ज्यादा युद्धपोतों ने हिस्सा लिया जिसमें अमेरिकी एयरक्रॉफ्ट कैरियर भी शामिल हैं. रूस के खिलाफ समंदर में मजबूती नेटो के लिए कितनी जरूरी है. सिर्फ समंदर नहीं ज़मीन पर भी नेटो देशों ने रूस को घेरने की तैयारी कर ली है.
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12 से 18 फरवरी के बीच जर्मनी और पोलैंड में ब्रिलिएंट जम्प वॉर एक्सरसाइज़ हुई. जर्मनी और पोलैंड से नेटो फोर्सेस किस तरह रूस से युद्ध की स्थिति में तेजी से बॉर्डर पर तैनात की जाएंगी. रूस के खिलाफ किस तरह तेज हमला किया जाएगा. इस एक्सरसाइज के जरिए नेटो देशों की सेनाओं ने इस चीज में महारत हासिल कर ली है.
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पोलैंड रूस के खिलाफ काफी आक्रामक है. और इस देश की सीमाएं सीधे यूक्रेन से लगती हैं. जर्मनी की सीमाएं पोलैंड से जुड़ी हैं. इसी वजह से नेटो सेनाएं यहां पर अपने आपको मजबूत कर रही हैं.
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25 फरवरी से 14 मार्च के बीच पौलैंड ने अपनी तीनों सेनाओं के प्रशिक्षण के लिए बड़ा युद्धाभ्यास ड्रैगन 24 भी किया.
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रूस के किसी संभावित हमले का जवाब देने के लिए 10 नेटो देशों के 20 हजार सैनिक और 3500 से ज्यादा बड़े हथियार मौजूद रहे, जिसमें पोलैंड के 15 हजार सैनिकों ने हिस्सा लिया.
रूस के खिलाफ नेटो की रणनीतिक तैयारियां कितनी मजबूत है. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि रूस को घेरने के लिए उन देशों में ही नेटो सेनाएं खुद को मजबूत कर रही हैं, जहां से रूस पर हमला करना सबसे आसान हो.
बेलारूस से सटे देशों को ज्यादा खतरा
रूस और बेलारूस से सटे यूरोपीय देशों को मॉस्को से सबसे ज्यादा खतरा है. इसलिए कभी रूस के अधीन रहे छोटे देश भी इलाके की सबसे बड़ी ताकत के खिलाफ अपना अस्तित्व बचाने के लिए सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार हैं. नेटो ने इन देशों में पिछले कुछ महीनों में अपनी तैयारी सबसे ज्यादा मजबूत की है. और इस वक्त भी रूस से सटे बेलारूस के बॉर्डर के पास नेटो सेनाएं युद्धाभ्यास कर रही हैं.
एक दौर में रूस का हिस्सा रहे बाल्टिक देशों में अब रूस पर अटैक की तैयारी साल के दूसरे महीने से ही शुरू हो गई थी. 28 फरवरी से 8 मार्च के बीच अमेरिकी सेना ने युद्धाभ्यास सेबर स्ट्राइक के तहत रूस से सटे बाल्टिक देशों में तेजी से तैनाती और ठंड के मौसम में रूस से सीधे युद्ध का अभ्यास किया.
ये युद्धाभ्यास एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, चेक गणराज्य, पोलैंड और स्लोवाकिया में हुआ.
यहां पर तैयारियों का मतलब समझिए
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एस्टोनिया, लातविया की सीमाएं सीधे रूस से जुड़ती हैं जबकि लिथुआनिया और पोलैंड की सीमाएं रूस के इलाके कैलिनिनग्राद और बेलारूस से जुड़ती हैं. वहीं पोलैंड की सीमा यूक्रेन से भी जुड़ती है. इसका मतलब यहां पर मजबूत नेटो रूस पर सीधा हमला कर सकता है.
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14 मई से 14 जून तक रूस के सबसे करीब मौजूद बाल्टिक देशों में भी नेटो एक्सरसाइज जारी हैं.
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इसमें से एक देश है लातविया जिसके बॉर्डर से रूस की राजधानी मास्को की दूरी करीब 600 किलोमीटर है. जहां पहुंचने में किसी सेना को सड़क मार्ग से सिर्फ 9 घंटे लगेंगे.
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इन देशों में बड़े पैमाने पर चल रही वॉर एक्सरसाइज़ रूस की टेंशन बढ़ाने वाली है.
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14 मई से नेटो देशों के पैराट्रूपर्स, एस्टोनिया, जॉर्जिया, लातविया, लिथुआनिया और पोलैंड में स्विफ्ट रिस्पॉन्स युद्धाभ्यास कर रहे हैं.
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14 जून तक चलने वाले इस युद्धाभ्यास में अमेरिका के साढ़े तीन हजार से ज्यादा और नेटो देशों के लगभग 10 हजार पैराट्रूपर्स आसमान से दुश्मन के इलाके में कूदकर भीषण हमला करने में अपनी महारत दिखा दी है.
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रूस से सटे नॉर्डिक देश फिनलैंड और स्वीडन में ठंड के मौसम में रूस की सेनाओं को जवाब देने का अभ्यास किया जा रहा है. ये वो इलाके हैं जहां से नेटो देशों की सेनाएं रूस के बड़े शहर सेंटपीटर्सबर्ग में तेज हमला कर सकती हैं.
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नॉर्डिक रिस्पांस युद्धाभ्यास में 14 देशों के 20 हजार से ज्यादा सैनिकों 50 से ज्यादा युद्धपोतों और 110 से ज्यादा एयरक्राफ्ट ने हिस्सा लिया. यहां भी ठंड में रूस से संभावित युद्ध का अभ्यास किया गया.
यूरोप के किसी देश का अकेले रूस के खिलाफ टिकना असंभव है. लेकिन अगर सम्मिलित रूप से ये रूस पर अटैक करते हैं तो भी इनके सेनाओं का तालमेल एक बड़ी चुनौती होगी. STEADFAST DEFENDER 2024 युद्धाभ्यास के दौरान अलग-अलग नेटो देशों में अलग अलग युद्ध रणनीतियों से जुड़े. युद्धाभ्यास इसी तालमेल को मजबूत करने के लिए किए गए ताकि रूस से युद्ध के दौरान नेटो सेना अलग अलग देशों की सेना ना लगे.
29 फरवरी से 15 मार्च के बीच ग्रीस, रोमानिया और जॉर्जिया में ट्रोजन फुटप्रिंट युद्धाभ्यास किया गया, जिसमें नेटो देशों की सेनाओं ने जरूरत पड़ने पर रूस में घुसकर किसी स्पेशल ऑपरेशन को अंजाम देने की प्रैक्टिस की. रोमानिया की सीमा यूक्रेन से जबकि जॉर्जिया की सीमा रूस से लगती है.
युद्ध की तैयारियां होती जा रही तेज
1 से 22 मई के बीच यूक्रेन से सटे देश हंगरी में भी रूस से युद्ध की तैयारियां की गईं. नेटो के बैटलग्रुप यहां पर BRAVE WARRIOR युद्धाभ्यास में एक साथ रूस पर अटैक की प्रैक्टिस कर चुके हैं. इन इलाकों में नेटो रूस के मुकाबले अपनी एयर सुपीरियरिटी बढा रहा है.
नेटो के युद्धाभ्यास की टाइमिंग भी दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध जैसी स्थिति की तरफ धकेलती दिखाई देती है. यूरोप में सर्दियां किसी भी सेना के लिए कितनी घातक होती हैं. इसका पता तो हिटलर की सेनाओं की रूस में हुई दुर्गति की कहानियां भी बयान करती हैं. मई जून तक युद्धाभ्यास ख़त्म करने के बाद नेटो सेनाओं के पास रूस को सबक सिखाने के लिए 6 महीने से ज्यादा का वक्त बचा रहेगा.
ठंड में युद्ध कैसे लड़ेंगे?
तो क्या इस बार यूरोप में सर्दियों से पहले नेटो और रूस की सेनाओं के बीच आर पार हो सकता है. यूरोप में कड़ाके की सर्दी दिसंबर में शुरू होती है इस वक्त यहां युद्ध लड़ना बेहद मुश्किल है.
तो रूस के खिलाफ रणनीति हर स्तर पर तैयार हुई है और जंग की इस रणनीति का चेहरा ना बाइडेन हैं ना मैक्रों हैं ना ही सुनक हैं. इन तैयारियों को संभालने वाल चेहरा कोई और है.
नेटो के महासचिव जेंस स्टोलटेन्बर्ग इस वक्त रूस के खिलाफ नेटो का मजबूत चेहरा बने हुए हैं. जेंस स्टोलटेन्बर्ग इस बात की वकालत कर रहे हैं कि जो घातक हथियार अमेरिका और नेटो देशों ने यूक्रेन को दिए हैं, रूस की ज़मीन पर भी उनके इस्तेमाल की इजाज़त मिलनी चाहिए. जेंस स्टोलटेन्बर्ग अगर अपनी बात मनवाने में सफल रहे तो रूस और नेटो देशों का सीधा युद्ध भी तय हो जाएगा.
बाइडेन ने भी दे दी इजाजत
इस बीच जेंस स्टोन्टेलबर्ग की सलाह पर अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन की ओर से यूक्रेन को अमेरिकी हथियारों के जरिए रूस के अंदर मौजूद उन हथियारों पर हमले की अनुमति दे दी गई है, जिनसे रूस यूक्रेन को निशाना बना रहा है, जिसने पुतिन के गुस्से को भड़का दिया है. लेकिन इस गुस्से से निपटने की तैयारी नेटो पहले ही कर चुका है. रूस के किसी भी आक्रमण के खिलाफ सबसे खतरनाक और बाहुबली हथियारों को परखा जा चुका है.
नैटो की हालत इस समय ऐसी है कि 32 देशों का समर्थन होने के बाद भी यूक्रेन में जीत उनसे दूर दिख रही है. क्या अब यूक्रेन के जरिये प्रॉक्सी वॉर करने के बदले नैटो ने अपने पुराने दुश्मन से खुद ही भिड़ने का फैसला कर लिया है.
युद्ध में नजर आएंगे घातक हथियार?
इस सवाल का जवाब वो अलग-अलग युद्धाभ्यास हैं जो यूरोप के हजारों किलोमीटर के इलाके में चल रही है. ऐसा लग रहा है साल 2024 में यूरोप की जमीन पर युद्ध का सीजन शुरु हो जाएगा. इस जंग की तैयारी में वो सब हथियार दिखाई दे रहे हैं, जिनपर दसियों सालों से रिसर्च-डेवलपमेंट के नाम पर अरबों-खबरों रुपये खर्च किये गये हैंऔर जिनके विश्वविजयी होने के दावे किये गये हैं.
दुनिया में जिस देश की वायुसेना सबसे ताकतवर होती है, उसे ही सबसे बलशाली माना जाता है. किसी भी वायुसेना की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं, उसके फाइटर जेट्स. अब यूक्रेन को ताकतवर बनाने के लिए एक फैसला लिया गया है, जिसका नाम है F-16 फाइटिंग फाल्कन. ये अमेरिका का एक सुपरसोनिक फाइटर जेट है, जो जल्द ही रूस की फौज का मुकाबला करने के लिए यूक्रेन में तैनात होने वाला है.
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दुनिया में कम से कम 26 देशों में ये फाइटर जेट मौजूद है और यूक्रेन इस लिस्ट में शामिल होने वाला 27वां देश बन जाएगा. F-16 की मदद से आसमान में दूसरे लड़ाकू विमानों पर हमला करने के साथ. जमीन पर बमबारी भी की जाती सकती है.
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यानी एक F-16 अलग-अलग किरदार निभा सकता है. इसलिये इसे मल्टीरोल जेट भी कहते हैं. सीधे-सीधे कहें तो F-16 के ही सहारे यूक्रेन की सेना..रूस को मात देने की कोशिश करेगी.
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यूक्रेन युद्ध का तीसरा साल चल रहा है, जिसमें बड़े बदलावों की उम्मीद है. यूक्रेन वॉरजोन में पहली बार अमेरिकी F-16 फाइटर जेट की एंट्री होने वाली है, जिसकी मदद से यूक्रेन को हवाई युद्ध में बढ़त मिल सकती है.
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जंग का सीधा फॉर्मूला है, जिसके पास आसमान का कंट्रोल होगा. जमीन पर बढ़त उसकी सेना को ही मिलेगी.. तो क्या यूक्रेन के दिन बदलने वाले हैं?
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यूक्रेन और उसका साथ देने वाले देश मिलकर भी रूस की सेना और हथियारों का मुकाबला नहीं कर पाये हैं.
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इसलिये अब यूक्रेन को ऐसे हथियार देने की कोशिशें हुईं जो जंग का नतीजा बदल सकें. क्या अमेरिका और यूरोपीय देशों से मिले हथियार यूक्रेन की जमीन पर पुतिन का कब्जा होने से रोक पाएंगे.
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यूक्रेन को F-16 फाइटर जेट पर भरोसा है पर ये यूक्रेन को मिलनेवाले बड़े हथियारों की सीरीज में आखिरी नहीं होगा. सीधे-सीधे कहें तो F-16 के साथ ही यूक्रेन वॉरजोन में एक नये प्रयोग की शुरुआत हो रही है.
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अमेरिका की कोशिश है धीरे-धीरे यूक्रेन के पक्ष में वो सभी हथियार उतार दिये जाएं जिससे पुतिन सेना पर डेंजर का लेवल एक-एक स्टेप करके बढ़ता रहे.अब यूरोप में ही उन शक्तिशाली हथियारों के साथ युद्धाभ्यास हो रहा है जिन्हें पश्चिमी दुनिया अजेय मानती है.
NATO सेना का एक ही टारगेट है पुतिन से बदला लेना. इसलिये युद्धाभ्यास में NATO मेंबर वही हथियार ला रहे हैं, जिसे रूसी सेना का मुकाबला करने के लिए बनाया गया है. जमीन पर टैंक से लेकर आसमान में लड़ाकू हेलीकॉप्टर्स फाइटर जेट्स और ड्रोन. हर वो हथियार यूरोप की मिलिट्री एक्सरसाइज का हिस्सा है जिन्हें ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और स्वीडन जैसे देश अपना नंबर वन बलवान मानते हैं.
पलभर में बदल सकते हैं युद्ध का नक्शा
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इन टैंक्स लड़ाकू हेलीकॉप्टरों और मिसाइलों को ऐसा-वैसा हथियार मानने की गलती ना कीजिएगा. ये हथियार दुनिया के किसी भी बैटलफील्ड में हार-जीत का फैसला कर सकते हैं. रूस ने इन पश्चिमी हथियारों को यूक्रेन सीमा के अलग-अलग मोर्चे पर परास्त किया है. लेकिन अगर ये मिलकर एक साथ रेड आर्मी के सामने इकट्ठा हो गए तो इनसे पार पाना महाशक्ति के लिए भी महाकठिन प्रोजेक्ट होगा.
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युद्ध में एक नया कॉन्सेप्ट है. नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर यानी हथियार चाहे जमीन पर हो.. आसमान में हो या समंदर. ये सभी मिलकर एक नेटवर्क में काम करते हैं. सबको सबके बारे में खबर होती है. आसान शब्दों में कहें तो ये एकता में बल वाला सिद्धांत है, जिसे रूस के खिलाफ लागू किया जाएगा.
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अगर यूरोप जंग का मैदान बना तो रूस के खिलाफ एक साथ तीन टैंक दिख सकते हैं. मेड इन अमेरिका एब्रैम्स टैंक. जर्मनी में बना लैपर्ड-टू (Leopard 2) टैंक और ब्रिटेन का मुख्य युद्धक टैंक चैलेंजर-टू (Challenger 2) अफगानिस्तान से लेकर इराक तक..दुनिया के अलग-अलग इलाकों में ये लड़ चुके हैं. विश्वविजयी होने का दावा करते हैं. पर यूक्रेन जंग में ये टैंक्स अपनी छाप छोड़ने में कामयाब नहीं हुए. इसकी वजह जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे.
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चैलेंजर-2 टैंक, एब्रैम्स टैंक या लेपर्ड टैंक. ये सब रूस के खिलाफ कोई बड़ा कारनामा नहीं कर पाये हैं. इसका मतलब ये नहीं है कि इन टैंकों में कोई खराबी है.
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असल में आज का बैटलफील्ड बहुत कठिन है, जिसमें जमीनी सेना अपनी रक्षा के लिए आसमानी हथियारों पर भरोसा करती हैं यानी कोई टैंक तभी कमाल दिखा पाएगा.
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अगर उसे आसमानी खतरों से बचाने के लिए वायुसेना के फाइटर जेट या लड़ाकू ड्रोन होंगे. फिलहाल यूक्रेन में यही दिक्कत है..जिसका सॉल्यूशन नैटो देश ढूंढ रहे हैं.
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रूस-यूक्रेन की जंग नई सदी की लड़ाई है जिसके नतीजे दुनिया को हैरान कर रहे हैं. जो टैंक कुछ दशकों पहले तक अजेय माने जाते थे, जिनकी एंट्री से ही जीत तय लगती थी. वो टैंक यूक्रेन वॉरजोन में कुछ घंटे ही टिक पाते हैं.
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छोटे-छोटे ड्रोन भी टनों वजनी टैंक का घमंड मिट्टी में मिला रहे हैं.
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रूस-यूक्रेन युद्ध में साल 2022 से 2024 की शुरुआत तक करीब 4000 टैंक नष्ट हो चुके हैं. अच्छे-खासे टैंकों को ड्रोन, एंटी टैंक मिसाइल, तोपखाने या बारूदी सुरंगों से बर्बाद किया गया.
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एक समय ऐसा लगा मानो टैंक अब बेकार हो चुके हैं. जंग के मैदान में टैंकों को कोई भविष्य नहीं है पर नैटो सेनाओं का भरोसा अब भी टैंकों की ताकत पर बना हुआ है.
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70 टन का एब्रैम्स टैंक सिर्फ 60 सेकंड में 10 गोले बरसा सकता है और दावा ये है कि 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ऊबड़-खाबड़ जमीन पर दौड़ते हुए भी इसकी तोप सटीक निशाना लगाती है.
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ब्रिटिश चैलेंजर-टू को मजबूत कवच वाला टैंक माना जाता है. दावा ये है कि सिर्फ एक मिनट में ये 8 अलग-अलग टारगेट्स पर हमला करके उनको उड़ा सकता है. ब्रिटेन के इस टैंक ने इराक युद्ध में भी अपना काबिलियत साबित की थी.
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जर्मनी का Leopard 2 टैंक, यूरोप के 13 देश इस्तेमाल करते हैं. भरोसे की वजह है इसका फायर कंट्रोल सिस्टम और एडवांस नाइट विजन जो रात में भी इसे दिन जैसे हमले की ताकत देते हैं.
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ये तीनों टैंक यूरोप में युद्ध लड़ने की काबिलियत रखते हैं. यानी इनकी मदद से ही नैटो देश रूस का मुकाबला करने की तैयारी में हैं.
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यूरोप में रूस से लेकर फ्रांस तक का बड़ा हिस्सा मैदानी इलाका है, जो किसी भी टैंक युद्ध के लिए एक आदर्श लोकेशन है. हालांकि जहां टैंक होंगे वहां उन्हें नष्ट करने वाले हथियार भी होंगे. अमेरिका सहित 19 देशों की सेनाएं अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्टर को इस्तेमाल करती हैं.
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इन हेलीकॉप्टरों ने इराक से अफगानिस्तान तक दुश्मन टैंकों का शिकार किया है. तो क्या ये हवाई शिकारी अब रूस के खिलाफ भी हमला करेगा. Apache की गिनती दुनिया के सबसे अच्छे और आधुनिक लड़ाकू हेलीकॉप्टरों में की जाती है. दुश्मनों के खिलाफ अमेरिकी सेना भी इसे अपना संकटमोचक मानती है.
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इसकी पहली खासियत है Hellfire Missile, जो करीब 11 किलोमीटर दूर मौजूद लक्ष्य पर अचूक निशाना लगा सकती है. इस मिसाइल का एक वार दुश्मन के 70 टन वजनी टैंक का खात्मा कर देता है.
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नए जमाने में युद्ध का कोई वक्त तय नहीं होता. ये दिन या रात कभी भी शुरू हो सकता है और Apache में लगे कैमरे रात के अंधेरे में भी दोस्त और दुश्मन की पक्की पहचान करके उसका अंत करने का प्रबंध कर देते हैं.
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दुश्मन के खिलाफ पहला हमला कम से कम वक्त में करना Apache की तीसरी खासियत है. Apache के पायलट जिस तरफ देखते हैं, उसमें लगी Automatic गन उसी दिशा में घूम जाती है. ताकि शत्रु पर अटैक करने में कोई देरी ना हो.
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Apache की चौथी ताकत है इसका फायर कंट्रोल रडार. इस Radar की मदद से ये एक साथ 256 लक्ष्य पर नजर रख सकता है. Apache के हथियार इतने घातक हैं कि रक्षा विशेषज्ञ इसे ‘हवाई टैंक’ भी कहते हैं.
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यूक्रेन को यूरोपीय देशों से घातक मिसाइलों का गिफ्ट मिला है. इसमें स्टॉर्म शैडो (Storm Shadow) जैसी लॉन्ग रेंज की मिसाइलें हैं. जो अपने-आप में एक उड़ता कंप्यूटर है. ये मिसाइल फायर एंड फॉरगेट यानी दागो और भूल जाओ के सिद्धांत पर काम करती है. आसान भाषा में कहें ये लंबी दूरी तक जाकर अपने लक्ष्य को पहचान करके..उसे तबाह करने में माहिर है.
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फ्रांस और ब्रिटेन ने मिलकर स्टॉर्म शैडो (Storm Shadow) मिसाइल बनाई. दावा ये कि इसके सामने बमप्रूफ बंकर भी ढेर हो जाता है. समंदर में तैरता कोई युद्धपोत हो या फिर दुश्मन का कमांड सेंटर. ये एक मिसाइल सारे लक्ष्यों का अकेला जवाब है.
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जब ये अपने टारगेट की तरफ बढ़ती है तो इसे कंट्रोल रूम से कोई मदद नहीं चाहिए. ये खुद ही दुश्मन के एयर डिफेंस से बचते हुए अपना लक्ष्य ढूंढ लेती है. आसमान में ऊंचाई पर जाकर अपने कैमरा से टारगेट की पहचान करके अचूक हमला करती है. ये मिसाइल जल्द ही रूस के अंदरूनी इलाकों में भी अटैक करती नजर आएगी.
अमेरिका जैसे पश्चिमी देश अपने बेस्ट हथियार लेकर आए, पर रूसी हथियार भी किसी से कम नहीं हैं. नैटो के वेपन्स टैक्नोलॉजी के हिसाब से एडवांस हैं पर हथियारों की संख्या के मामले में रशिया आगे है. नैटो की कोशिश तकनीकी तौर पर आगे रहने की है. तो रूसी तरीका है किसी भी हथियार को तेजी से और ज्यादा संख्या में बनाया जाए.
अक्सर नैटो देश और रूस एक-दूसरे के हथियारों की बराबरी करते दिखते हैं. एक और खासियत ये भी है एक-दूसरे के हथियारों की काट बनाने में भी ये किसी से कम नहीं हैं..
जैसे अमेरिका के ड्रोन्स ने शुरुआती दौर में अचूक वार किया पर जल्दी ही रूस के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जाल में फंसकर ये ड्रोन हवा में ही दम तोड़ने लगे. ये हमला अदृश्य होता है..पर इसका असर सामने नजर आता है.
ड्रोन दीवार बनाने की प्लानिंग
रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद जंग का तरीका बदल रहा है. अब 6 नैटो देशों ने मिलकर रूस के खिलाफ ड्रोन की दीवार बनाने की प्लानिंग की है. रूस की सीमा के करीब ऐसी ड्रोन सेना तैयार की जाएगी जिसमें निगरानी से लेकर लड़ाकू ड्रोन तक शामिल होंगे. किसी सेना और दूसरे हथियारों के मुकाबले कम खर्च में ही ड्रोन आर्मी रेडी हो जाएगी और सटीक हमले की बात करें तो ड्रोन आजकल रेस में सबसे आगे चल रहे हैं.
ड्रोन दीवार का मतलब है ऐसी ड्रोन सेना जो दुश्मन पर नजर रखेगी. हेडक्वार्टर को खबर देगी और जरूरत हुई तो ऑटोमैटिक तरीके से हमले का फैसला भी लेगी. रूस के आसपास एडवांस तकनीक वाले ये ड्रोन तैनात होंगे, जिनमें कैमरे के साथ सेंसर्स भी होंगे. ये सिर्फ रूसी सेना का ही नहीं बल्कि आसमान में रूस के ड्रोन का भी एनकाउंटर करेंगे.
आजकल युद्ध किसी वीडियो गेम जैसे हो गए हैं, जो मोबाइल फोन और टीवी की स्क्रीन पर लड़े जा रहे हैं. क्या इनका मकसद जंग जीतने के अलावा कुछ और है.
दुनिया के बड़े-बड़े देश अपने Weapons की नुमाइश के लिये वीडियोज जारी करते हैं. ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो उनके हथियारों की काट किसी दूसरे के पास मौजूद नहीं है. ऐसा करने के दो मकसद होते हैं. पहला अपने विरोधी को डराना और दूसरा. अपने साझीदार, सहयोगी और मित्र देशों में हथियारों के लिए बाजार तलाश करना. यूक्रेन युद्ध में नैटो और अमेरिकी देशों की तरह से हथियार भेजने के पीछे ये एक बड़ी वजह है. मतलब यूक्रेन में पश्चिमी देशों की तरफ से रूस के खिलाफ युद्ध से ज्यादा हथियारों की मार्केटिंग हो रही है.
हथियारों का सबसे बड़ा सौदागर अमेरिका
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जंग चाहे रूस-यूक्रेन की हो, इजरायल-हमास का संघर्ष हो, ताइवान में टेंशन बढ़े या फिर नैटो देशों का युद्धाभ्यास हो. हर जगह पर अमेरिका चौधरी बनकर पहुंच जाता है. इसकी वजह है अमेरिका की हथियार बेचने वाली नीति, जिसके लिए वॉशिंगटन की सरकार किसी भी हद तक पहुंच जाती है
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. यूक्रेन एक ऐसा डरावना उदाहरण है जिसकी वजह से अमेरिका के लिए हथियार बेचना आसान हो गया है.
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रूस-यूक्रेन में भिड़ंत के बाद दुनिया में हथियारों को बेचने-खरीदने के तरीके में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है. यूरोप के कई शांतिप्रिय देशों ने अचानक ही सेना और अस्त्र-शस्त्रों पर खर्च बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है और आंकड़े बता रहे हैं कि यूरोप के डर का फायदा अमेरिका को हो रहा है. यानी सबसे ज्यादा कमाई अमेरिकी कंपनियों को हो रही है.
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जब भी दुनिया पर जंग का खतरा मंडराता है तो हथियारों पर खर्च बढ़ जाता है और ऐसे मौके का फायदा उठाने में अमेरिका हमेशा आगे रहता है.
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फरवरी 2022 में जैसे ही रूस-यूक्रेन का संघर्ष शुरू हुआ तो अमेरिका तुरंत पेट्रोल छिड़कने पहुंच गया. यूक्रेन को जमकर हथियार दिए पर युद्ध लंबा खिंचा तो अमेरिका ने नैटो देशों पर मदद भेजने के लिए दबाव डाला.
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जब इजरायल ने हमास के खिलाफ ऑपरेशन शुरू किया तब भी अमेरिका ने इजरायल को गोला-बारूद समेत अनलिमिटेड सपोर्ट भी दिया.
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ताइवान को लेकर चीन आक्रामक रहता है, जबकि अमेरिका हथियारों के साथ ताइवान को समर्थन भी देता रहा है.
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नैटो देशों के युद्धाभ्यास को भी अमेरिकी कंपनियां अपने हथियारों का प्रदर्शन करने के लिए इस्तेमाल करती हैं. संघर्ष से लेकर मिलिट्री ड्रिल तक अमेरिका ने हथियारों वाला सपोर्ट दिया है ताकि बारूद का कारोबार नॉनस्टॉप चलता रहे.
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अमेरिका बहुत वर्षों से दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार बेचनेवाला देश रहा है पर अब तो सुपरपावर इतना आगे निकल गया है कि दूर-दूर तक कोई और दिखाई नहीं दे रहा.
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हथियार एक्सपोर्ट करने के मामले में अमेरिका शतक मार चुका है. इस समय दुनिया में 193 मान्यता प्राप्त देश हैं और इनमें आधे से ज्यादा यानी 107 देशों को अमेरिका अपने हथियार एक्सपोर्ट कर रहा है.
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यूक्रेन पर हमले के बाद यूरोपीय देशों ने जमकर हथियारों की शॉपिंग की. दूसरे इलाके में मौजूद देश भी पीछे नहीं है और इसका सीधा फायदा अमेरिकी सरकार और हथियार कंपनियों को हो रहा है.
किसने कितने हथियार खरीदे
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अमेरिका ने पोलैंड को करीब 30 बिलियन डॉलर में अपाचे हेलीकॉप्टर, रॉकेट सिस्टम, एब्रैम्स टैंक और रडार सिस्टम बेचे.
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जर्मनी ने 11.4 बिलियन डॉलर में चिनूक हेलीकॉप्टर और मिसाइलें खरीदीं.
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ऑस्ट्रेलिया ने 6 बिलियन डॉलर में C-130 एयरक्राफ्ट्स लिया.
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चेक रिपब्लिक ने 5.6 बिलियन डॉलर में F-35 फाइटर जेट्स और बारूद लिया.
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बुल्गारिया ने बख्तरबंद स्ट्राइकर गाड़ियों के लिये 1.5 बिलियन डॉलर की डील की.
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और नॉर्वे ने 1 बिलियन डॉलर में हेलीकॉप्टरों से जुड़े उपकरण खरीदे.
कोई भी जंग बिना हथियारों के नहीं लड़ी जा सकती और हथियार बेचने के मामले में अमेरिका दुनिया में पहले नंबर पर है. आंकड़ों से साफ है कि जब युद्ध का डर फैला तो अमेरिकी कंपनियों ने नोट छापना शुरु कर दिया. लेकिन युद्ध में शामिल होने की वजह से रूस का हथियारों वाला एक्सपोर्ट अचानक नीचे गिर गया.
यूक्रेन में जंग लड़ने का सबसे ज्यादा नुकसान रूस को हुआ है. एक तो वो हथियार एक्सपोर्ट नहीं कर पा रहा. दूसरा प्रतिबंधों की वजह से गिनती के देश ही उसे गोला-बारूद दे रहे हैं. रशिया का वेपन एक्सपोर्ट लगातार गिर रहा है. हथियार बेचने वालों की ग्लोबल रैंकिंग अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर रशिया होता था पर अब फ्रांस ने उसकी जगह पर कब्जा कर लिया है.
हथियारों का डिजाइन और निर्माण अपने-आप में अरबों-खरबों डॉलर की इंडस्ट्री है. हर देश चाहता है कि उसके हथियार दुनिया के ज्यादा से ज्यादा देश इस्तेमाल करें.अब दूसरे देश भी हथियार बेचने की रेस में अमेरिका की तरह रफ्तार पकड़ रहे हैं.
फ्रांस भी हथियार बेचने में आगे
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फ्रांस अब रशिया की जगह पर कब्जा करके दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियारों का एक्सपोर्टर बन चुका है. 2022 में फ्रांस ने करीब 29 बिलियन डॉलर के हथियार बेचे और 2021 के मुकाबले ये आंकड़ा दोगुने से भी ज्यादा है.
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नैटो के 32 सदस्य देश अपना-अपना रक्षा खर्च बढ़ा रहे हैं. इसका फायदा उठाने में भी अमेरिकी कंपनियां आगे हैं क्योंकि हथियार बनाने में भी अमेरिका, रूस और चीन के अपने-अपने ग्रुप बने हुए हैं और कोई गुट दूसरे से हथियार नहीं खरीदता है.
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यही वजह है कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर देश है.जिसने साल 2014 से 2018 के मुकाबले साल 2019 से 2023 के बीच कुल 17 फीसदी ज्यादा हथियार बेचे.
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यूरोपीय देशों ने अपने 55 फीसदी हथियार अमेरिका से खरीदे हैं
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2023 में अमेरिका ने रिकॉर्ड 238 बिलियन डॉलर से ज्यादा के हथियार दुनिया भर में सप्लाई किये.
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अगर दुनिया के किसी कोने में युद्ध ना हो, तो हथियारों की बिक्री घट जाएगी, जिसका असर अमेरिका की इकॉनमी पर पड़ेगा..पर युद्ध की वजह से अमेरिका की कमाई फुल स्पीड से बढ़ रही है.
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अमेरिका में जिस समय दूसरी कंपनियों के शेयर नीचे गिर रहे थे. उस वक्त भी हथियार बेचने वाली कंपनियां पैसे छापने में व्यस्त थीं. आप सोचिये कि युद्ध की आशंका से कई देशों पर मंदी के बादल छा गये पर वेपन बनाने वाली कंपनियों के शेयर किसी रॉकेट की तरह कमाई का रिकॉर्ड बना रहे हैं.
अमेरिकी सरकार हथियार बेचने के लिये साम, दाम, दंड, भेद जैसी नीति अपनाती है..हथियार बेचने में अमेरिकी कंपनियों का दबदबा है..साथ ही रूस के हथियार एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध लगाकर अमेरिका ने अपनी कंपनियों को फलने-फूलने का पूरा मौका दिया है.
हथियार बेचने के चक्कर में यूक्रेन का युद्ध भड़क गया है और ऐसा लग रहा है मानो यूक्रेन के बाद रूस की सेना सीधे अमेरिका को टारगेट करेगी.
जब जंग को टालने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं तो आखिरी जंग शुरू होती है और आखिरी जंग या तो किसी एक को ख़त्म करती है या सब कुछ ख़त्म कर देती है. रूस वो महाशक्ति है जो दुनिया को जीत नहीं सकती लेकिन दुनिया को ख़त्म करने की ताकत ज़रूर रखती है.
यूक्रेन वॉर की शुरुआत में नेटो ने इस बात का ख्याल रखा था रूस को अपने हमले की रेंज यूक्रेन से आगे बढ़ाने के लिए मजबूर ना किया जाए. लेकिन अब खुद महायुद्ध की तैयारी कर चुके नेटो का रुख बदल चुका है.
…तो मच सकती है तबाही
अमेरिकी हथियारों से सीधे रूस की ज़मीन पर हमला हुआ तो अब तक यूक्रेन को तबाह कर रहे रूस में भी वैसी ही तबाही होगी जैसी कीव,खारकीव और खेरसॉन जैसे इलाकों में देखी गई थी. आने वाले कुछ दिनों में रूस पर ऐसे हमलों की खबरें बढ़ने वाली हैं. क्योंकि अब तक रूस से सीधे टकराव से बच रहे अमेरिका ओर नेटो ने वॉर प्लान चेंज कर दिया है.
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने यूक्रेन को अमेरिकी हथियारों से रूस पर हमला करने की छूट दे दी है. इसने राष्ट्रपति पुतिन का गुस्सा बढ़ा दिया है. पुतिन पहले ही एलान कर चुके थे उनके देश पर जिस देश के हथियार से हमला हुआ वो उनके निशाने पर होगा. तो क्या पुतिन अब अमेरिका पर भी हमला कर सकते हैं या यूरोप में मौजूद अमेरिकी ठिकाने रूसी सेना के निशाने पर आने वाले हैं.
पिछले कुछ दिनों में जिस तरह यूक्रेन वॉर ज़ोन में रूस का दबदबा बढ़ रहा था…रूस के दमदार आक्रमण के बाद खारकीव जैसे इलाके में यूक्रेन की सेनाओं को पीछे हटना पड़ रहा था. उसे देखते हुए बाइडेन ने जेलेंस्की और नेटो देशों की वो डिमांड पूरी कर दी जो रूस यूक्रेन वॉर का रुख बदल देगी.
और बाइडेन की अमेरिकी हथियारों से रूस पर हमले की हरी झंडी के बाद जिस बात की आशंका थी वो ही हुआ. पुतिन के भरोसेमंद और पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने परमाणु हमले की धमकी देते हुए ये भी साफ कर दिया इसे मज़ाक ना समझा जाए.
रूस ने बाइडेन के निर्देश को रूस के खिलाफ पूर्ण युद्ध माना है और अब ऐसे किसी हमले की प्रतिक्रिया क्या हो सकती है उस पर चर्चा शुरू हो गई है.
रूस ने दी थी परमाणु धमकी
इधर रूस की परमाणु धमकी के फौरन बाद अमेरिका के परमाणु बॉम्बर बी 52 ने ब्रिटेन से उड़ान भरकर रूसी सैन्य बेस केलिनिनग्राद के चारों तरफ चक्कर लगाया. और बी 52 बॉम्बर की सुरक्षा के लिए स्पेन के एफ 18 हॉर्नेट, जर्मनी के यूरोफाइटर टाइफून और पोलैंड मिग 29 फाइटर जेट मौजूद रहे. इसके बाद बी 52 बॉम्बर ब्रिटेन लौट गया.
माना जा रहा है ऐसा करके अमेरिका ने रूस को चेतावनी दी है कि रूस के हमले के जवाब में वो क्या कर सकता है.
अमेरिका की इस उकसावे की कार्रवाई से पहले रूस के खिलाफ नेटो का चेहरा बनकर उभर रहे जेंस स्टोलटेनबर्ग ने भी नेटो के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में इस बात की जानकारी दी थी की नेटो हथियारों से रूस पर हमला शुरू हो चुका है.
यूक्रेन वॉर शुरू होने के बाद रूस के खिलाफ अब तक नेटो ने ऐसी उकसावे की कार्रवाई नहीं की थी. लेकिन अब नेटो आर पार के मूड में नजर आ रहा है. अगर नेटो रूस के बॉर्डर पर खुद को मजबूत कर रहा है तो रूस को भी इसकी पूरी जानकारी है. रूस ने परमाणु एक्सरसाइज़ करके नेटो देशों को इस बात की चेतावनी भी दे डाली है कि उनके देश पर हमला करने वालों को कितना खौफ़नाक जवाब दिया जाएगा. लेकिन इसका बहुत ज्यादा असर पड़ता नहीं दिख रहा.
लेकिन जिस तरह नेटो देश रूस को घेर रहे हैं. इस बात की आशंका जाहिर की जाने लगी है. रूस और नेटो की सेनाएं सीधे आमने सामने आ सकती हैं. ऐसा हुआ तो दुनिया के लिए ये काफी बुरी खबर साबित होगी.
रूस नेटो की आक्रामकता को काफी दिनों से महसूस कर रहा है और इससे निपटने के लिए रूस ने तैयारियां भी काफी पहले से शुरू कर दी थीं. रूस की रक्षा कंपनियों ने प्रोडक्शन कई गुना बढ़ा दिया है. रूस ने स्मार्ट सैलरी पर हजारों नए सैनिकों को भर्ती करके अपनी सेना को काफी मजबूत कर लिया है, जिसे नेटो देश भौचक्के हैं.
रूस की सेना 15 फीसदी बड़ी
नेटो की तैयारियों को देखते हुए रूस ने अपनी तैयारियों को 5वें गियर में डाल दिया है. यूक्रेन वॉर शुरू होने से पहले की तुलना में रूस की सेना आज 15 फीसदी बड़ी है. रूस इस साल सभी नेटों देशों से ज्यादा गोला बारूद का प्रोडक्शन करने वाला है. यूक्रेन को अमेरिकी और नेटो देशों से मदद के एलान के बाद पुतिन ने अपनी रक्षा कंपनियों को प्रोडक्शन बढ़ाने और रिपेयर वर्क में तेजी लाने के आदेश भी दिए थे. जिसका असर अब दिख रहा है. और इसके अलावा रूस के परमाणु हथियार उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं.
परमाणु युद्ध का मतलब है यूरोप का खात्मा क्योंकि अगर परमाणु विस्फोट हुआ तो सिर्फ एक धमाके पर बात नहीं रुकने वाली. रूस और नेटो देशों के पास परमाणु हथियारों के सबसे बड़े भंडार मौजूद हैं. इसलिए नेटो और रूस के बीच बढ़ रहा तनाव सीधे परमाणु जंग में तब्दील होगा. लेकिन रूस जंग हारने लगा तो कुछ भी हो सकता है.
यूक्रेन वॉर ज़ोन में रूस एक तरह से नेटो की सम्मिलित शक्ति का मुकाबला रहा है. ये इसलिए संभव हो पाया क्योंकि मास्को ये लड़ाई मेड इन रूस हथियारों से लड़ रहा है. लेकिन अपनी जीडीपी का 2 परसेंट रूस के खिलाफ वॉर की तैयारी में खर्च करने की तरफ बढ़ रहे देशों और अमेरिका जैसी महाशक्ति का मुकाबला क्या रूस अकेले कर पाएगा. ये इतना आसान नहीं लगता.
नेटो भले ही 32 देशों का सैन्य समूह हो. लेकिन रूस के आस पास के नेटो देशों के लिए रूस पर नेटो का हमला गंभीर परिणाम ला सकता है. क्योंकि जितने विनाशकारी हथियार रूस के पास मौजूद हैं उनका इस्तेमाल पुतिन ने कर दिया. तो कई देशों का अस्तित्व भी नष्ट हो सकता है. और इस बात की भी पूरी संभावना है रूस का साथ देने के लिए भी दुनिया के कई देश मैदान में उतर जाएं.
मॉस्को से युद्ध इतना नहीं होगा आसान
परमाणु महाशक्ति रूस के हथियारों की क्वालिटी रेंज और प्रोडक्शन की क्षमता को देखते हुए नेटो के लिए मास्को से युद्ध आसान नहीं होगा. लेकिन अगर नेटो की सेनाएं भारी पड़ीं तो रूस के पास भी ऐसे दोस्त मौजूद हैं जो युद्ध में कूद सकते हैं. चीन और उत्तर कोरिया जैसे देश भी बड़े युद्ध की तैयारी में जुटे हैं. उनका साथ मिला तो ये संभावित युद्ध विश्वयुद्ध में बदल जाएगा. चीन, उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देशों की ताकत अगर रूस के साथ मिलती है तो नेटो देशों के लिए ये मुकाबला और मुश्किल हो जाएगा.
दुनिया के लिए मुश्किलें बढ़नी तय
फिलहाल मास्को से खबर ये भी आ रही है. पुतिन ने अपनी विरासत को आगे बढ़ाने वाले चेहरे को भी चुन लिया है. पुतिन के इस भरोसेमंद बॉडीगार्ड एलेक्सी ड्यूमिन को बड़ी जिम्मेदारी दे दी गई है. यानि पुतिन के बाद भी पुतिन का मकसद जिंदा रहेगा और नेटो के लिए खतरा कभी कम नहीं होगा.
अमेरिका और रूस की प्रतिद्वंदिता अब ऐसे मोड़ पर है, जहां से दोनों के बीच सीधी टक्कर का रास्ता दिख रहा है. दोनों महाशक्तियों ने एक-दूसरे से जंग के लिये विश्व-विनाशक हथियार तैयार किये हैं पर गलती से भी युद्ध हुआ तो फिर ना रूस-अमेरिका बचेंगे और ना ही दुनिया.
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