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Special Status: वर्तमान प्रावधानों के तहत राज्यों को विशेष दर्जा देना संभव नहीं, तो बिहार-आंध्र का क्या होगा?

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Special Status: वर्तमान प्रावधानों के तहत राज्यों को विशेष दर्जा देना संभव नहीं, तो बिहार-आंध्र का क्या होगा?

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Under current provisions, special status for states unviable; Centre has option to release financial packages

नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू
– फोटो : एएनआई

विस्तार


केंद्र में गठबंधन सरकार बनने के साथ बिहार और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों द्वारा विशेष दर्जे की मांग फिर से चर्चा में है। मोदी 3.0 पर उनके दो महत्वपूर्ण गठबंधन सहयोगियों बिहार से जदयू और आंध्र प्रदेश से टीडीपी का दबाव होगा कि वे उनके राज्यों को विशेष दर्जा दें। लेकिन मौजूदा प्रावधानों के तहत, राज्यों के लिए विशेष दर्जा का कोई नियम नहीं है। अगस्त 2014 में 13वें योजना आयोग के भंग होने के बाद से 14वें वित्त आयोग ने विशेष और सामान्य श्रेणी के राज्यों के बीच कोई अंतर नहीं किया है।

सरकार ने 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया और 1 अप्रैल, 2015 से केंद्र से राज्यों को कर हस्तांतरण 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत कर दिया और संसाधन अंतर का सामना करने वाले राज्यों को राजस्व घाटा अनुदान का एक नया प्रावधान भी जोड़ा।

नए प्रावधान के तहत, 2015-16 में राज्यों को कुल हस्तांतरण 2014-15 में 3.48 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 5.26 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो 1.78 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि थी। राज्यों का हिस्सा जनसांख्यिकीय प्रदर्शन को प्रोत्साहित करने के लिए एक सूत्र द्वारा तय किया जाता है और प्रत्येक राज्य अपने स्वयं के कर राजस्व को जुटाने का प्रयास करता है।

यह फार्मूला भौगोलिक क्षेत्र, वन क्षेत्र और राज्य की प्रति व्यक्ति आय को भी ध्यान में रखता है। एनके सिंह की अध्यक्षता में 15वें वित्त आयोग ने कर हस्तांतरण को संशोधित किया है और 2019 में जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में बनाए जाने के बाद इसे 42 प्रतिशत से घटाकर 41 प्रतिशत कर दिया है। इसलिए राज्यों को वर्तमान कर हस्तांतरण 2026 तक 41 प्रतिशत है।

विशेष श्रेणी के दर्जे के तहत, जो मार्च 2015 तक लागू था, विशेष श्रेणी के राज्यों को सभी केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए केंद्र से वित्तीय योगदान का 90 प्रतिशत मिल रहा था, राज्यों का योगदान केवल 10 प्रतिशत तक सीमित था। असम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम, सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों को 2015 से पहले विशेष श्रेणी राज्य का दर्जा दिया गया था। 

90:10 का नियम अभी भी पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों पर लागू है, हालांकि कोई विशेष दर्जा श्रेणी नहीं है। अन्य सभी राज्यों को 60:40 के अनुपात में केंद्रीय वित्त पोषण प्राप्त होता है, जिसमें 60 प्रतिशत केंद्र सरकार का योगदान होता है और 40 प्रतिशत राज्यों का होता है।

अगर मोदी 3.0 के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार इस दर्जे पर फिर से विचार करने और विशेष श्रेणी के दर्जे के लिए बिहार और आंध्र प्रदेश की मांगों को पूरा करने का फैसला करती है, तो प्रस्ताव को मंजूरी के लिए अरविंद पनगढ़िया के तहत 16 वें वित्त आयोग या नीति आयोग को भेजा जाना चाहिए। बिहार और आंध्र प्रदेश के अलावा, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और राजस्थान भी विशेष श्रेणी के दर्जे की मांग कर रहे हैं।

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