Home Breaking News आज का शब्द: अंबुधि और हरिवंशराय बच्चन की कविता- नर्तन कर, नागिन, मेरे जीवन के आँगन में!

आज का शब्द: अंबुधि और हरिवंशराय बच्चन की कविता- नर्तन कर, नागिन, मेरे जीवन के आँगन में!

0
आज का शब्द: अंबुधि और हरिवंशराय बच्चन की कविता- नर्तन कर, नागिन, मेरे जीवन के आँगन में!

[ad_1]

                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अंबुधि, जिसका अर्थ है- समुद्र, सागर। प्रस्तुत है हरिवंशराय बच्चन की कविता- नर्तन कर, नागिन, मेरे जीवन के आँगन में !
                                                                 
                            

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

तू प्रलय काल के मेघों का
कज्जल-सा कालापन लेकर,
तू नवल सृष्टि की ऊषा की
नव द्युति अपने अंगों में भर,
बड़वाग्नि-विलोडि़त अंबुधि की
उत्तुंग तरंगों से गति ले,
रथ युत रवि-शशि को बंदी कर
दृग-कोयों का रच बंदीघर,
कौंधती तड़ित को जिह्वा-सी
विष-मधुमय दाँतों में दाबे,
तू प्रकट हुई सहसा कैसे
मेरी जगती में, जीवन में?
नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

तू मन मोहिनी रंभा-सी,
तू रूपवती रति रानी-सी,
तू मोहमयी उर्वशी सदृश,
तू मनमयी इंद्राणी-सी,
तू दयामयी जगदंबा-सी
तू मृत्यु सदृश कटु, क्रूर, निठुर,
तू लयंकारी कलिका सदृश,
तू भयंकारी रुद्राणी-सी,
तू प्रीति, भीति, आसक्ति, घृणा
की एक विषम संज्ञा बनकर,
परिवर्तित होने को आई
मेरे आगे क्षण-प्रतिक्षण में।
नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

प्रलयंकर शंकर के सिर पर
जो धूलि-धूसरित जटा जूट,
उसमें कल्पों से सोई थी
पी कालकूट का एक घूँट,
सहसा समाधि का भंग शंभु,
जब तांडव में तल्लीन हुए,
निद्रालसमय, तंद्रानिमग्न
तू धूमकेतु-सी पड़ी छूट;
अब घुम जलस्थल-अंबर में,
अब घूम लोक-लोकांतर में
तू किसको खोजा करती है,
तू है किसके अन्वीक्षण में?
नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!
 

आगे पढ़ें

6 घंटे पहले

[ad_2]

Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here