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18वीं लोकसभा में सत्ताधारी दलों के साथ विपक्षी दलों की भी अग्निपरीक्षा
– फोटो : अमर उजाला
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लोकसभा चुनावों में चाहते न चाहते जाने अनजाने आखिरकार मुकाबला मोदी बनाम राहुल हो गया और अब आगे की राजनीति भी मोदी बनाम राहुल ही होगी। क्योंकि जिस तरह का जनादेश जनता ने दिया है उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी दोनों को ही लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा देनी होगी। जहां प्रधानमंत्री मोदी को अब गठबंधन सरकार को सफलता पूर्वक चलाने की चुनौती है तो राहुल गाधी के सामने विपक्षी इंडिया गठबंधन को एकजुट बनाए रखते हुए सरकार को घेरने की अहम जिम्मेदारी है।ये दोनों अग्निपरीक्षाएं भारतीय राजनीति के इन दोनों शीर्ष नेताओं को अलग अलग देनी हैं।लेकिन जिस तरह 18 वीं लोकसभा चुनकर आई है उसमें देश की राजनीति में दो नेताओं की भूमिका बेहद अहम हो गई है।सत्ता पक्ष में राजनाथ सिंह सरकार के संकट प्रबंधक बन कर उभरे हैं तो विपक्ष में मल्लिकार्जुन खरगे की भूमिका एक अभिभावक नेता की बनती जा रही है।जहां मोदी और राहुल एक दूसरे पर पहले की तरह आक्रामक रहेंगे वहीं इन दोनों नेताओं पर पक्ष विपक्ष के बीच भड़कने वाली सियासी आग पर पानी डालने और अपने अपने खेमों को एकजुट बनाए रखने की होगी।
केंद्र में तीसरी बार सरकार बनाकर नरेंद्र मोदी ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की बराबरी कर ली है।लेकिन फर्क ये है कि नेहरू ने तीसरी बार भी अपनी पार्टी कांग्रेस के लिए प्रचंड बहुमत जुटाया था और उनके सामने विपक्ष इतना मजबूत नहीं था जितना अब है।लेकिन मोदी की सरकार में उनके दल भाजपा को अकेले बहुमत नहीं है और सरकार बनाने और चलाने के लिए भाजपा की चंद्रबाबू नायडू नीतीश कुमार अनुप्रिया पटेल जयंत चौधरी पवन कल्याण जीतनराम मांझी एकनाथ शिंद अजीत पवार के दलों वाले एनडीए पर निर्भरता है।मोदी राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी हैं और पहले करीब 13 साल गुजरात और फिर पिछले दस साल केंद्र में सफल सरकार चलाने का उन्हें अनुभव है।लेकिन गुजरात से लेकर केंद्र तक मोदी ने अभी तक अपने दल के पूर्ण बहुमत वाली सरकारें अपनी हनक और धमक से चलाई हैं।उन्हें गठबंधन सरकार चलाने का तजुर्बा नहीं है।हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए की गठबंधन सरकार के वक्त वह पहले दिल्ली में भाजपा के महासचिव और फिर गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए उनके रिश्ते भाजपा के सहयोगी दलों के नेताओं के साथ रहे हैं।चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार तब भी वाजपेयी सरकार के हिस्से थे।इसलिए उनके साथ संवाद और संपर्क में मोदी को कोई समस्या नहीं है।
हालांकि, अभी तक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की कार्यशैली एक मजबूत और धमक वाले ऐसे नेता की रही है जिसके सामने पार्टी और सरकार में बाकी सारे नेता बौने हो जाते हैं।जबकि अटल बिहारी वाजपेयी की कार्यशैली में समावेशिता का पुट ज्यादा था और वह सत्ता के विकेंद्रीकरण और जिम्मेदारियों के हस्तांतरण में भरोसा रखते थे।इसके विपरीत मोदी सरकार सत्ता के केंद्रीयकरण और मोदी द्वारा सब कुछ अपने ऊपर ले लेने की लिए जानी जाती रही है।इसीलिए नोटबंदी, लॉकडाऊन, सीएए, अनुच्छेद 370, जीएसटी जैसे फैसले तमाम अवरोधों के बावजूद सरकार ले सकी।नोटबंदी और लॉकडाऊन जैसे फैसले जिस तरह अचानक घोषित किए गए वो किसी गठबंधन सरकार में मुमकिन नहीं हैं।ऐसे किसी भी फैसले के लिए जिसमें किसी भी तरह के विवाद की संभावना हो उसे लेने से पहले सहयोगी दलों से परामर्श करना और उनकी सलाह के मुताबिक उसमें फेरबदल करने के लिए तैयार रहना गठबंधन सरकार की कामयाबी की पहली शर्त होती है।सरकार बिना किसी अवरोध के चले इसके लिए भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सहयोगी दलों खासकर तेलुगू देशम और जनता दल यू की भावनाओं और संवेदनाओं का ध्यान रखना होगा।
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