Home Breaking News आज का शब्द: मरु और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता- मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा?

आज का शब्द: मरु और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता- मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा?

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आज का शब्द: मरु और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता- मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा?

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                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- मरु, जिसका अर्थ है- मरुभूमि या बालू का निर्जल मैदान, रेगिस्तान। प्रस्तुत है सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता-  मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा?
                                                                 
                            

मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा? 
स्तब्ध, दग्ध मेरे मरु का तरु 
क्या करुणाकर खिल न सकेगा? 

जग के दूषित बीज नष्ट कर, 
पुलक-स्पंद भर, खिला स्पष्टतर, 
कृपा-समीरण बहने पर, क्या 
कठिन हृदय यह हिल न सकेगा? 

मेरे दु:ख का भार, झुक रहा, 
इसीलिए प्रति चरण रुक रहा, 
स्पर्श तुम्हारा मिलने पर, क्या 
महाभार यह झिल न सकेगा? 

7 hours ago

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