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आरबीआई (फाइल फोटो)
– फोटो : ANI
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महंगाई घटने के बावजूद मौद्रिक नीतियों को लगातार सख्त बनाए रखने से देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार प्रभावित हो सकती है। आरबीआई को महंगाई से ध्यान हटाकर अब आर्थिक वृद्धि पर ध्यान देना होगा, जिसके लिए ब्याज (रेपो) दर में कटौती करने की जरूरत है। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के दो बाहरी सदस्यों आशिमा गोयल और जयंत आर वर्मा ने कहा, महंगाई के खिलाफ लड़ाई में आर्थिक वृद्धि की कीमत चुकानी पड़ी है। हालांकि, असहनीय रूप से उच्च महंगाई की लंबी अवधि खत्म हो रही है। अगली कुछ तिमाहियों में हम महंगाई में अधिक कमी देखेंगे और यह धीमे-धीमे चार फीसदी के लक्ष्य पर आ जाएगी।
वर्मा ने कहा, मौद्रिक नीति आमतौर पर तीन से पांच तिमाहियों के अंतराल के साथ काम करती है। इसका मतलब है कि उच्च ब्याज दरें अगले साल विकास दर को प्रभावित करेंगी। 2023-24 की तुलना में मैं 2024-25 और 2025-26 में जीडीपी की वृद्धि दर को लेकर अधिक चिंतित हूं। 2023-24 में मजबूत पकड़ वाली वृद्धि जो हमने देखी है, वह इन चिंताओं को कम करने के लिए बहुत कम है। अब हमें जीडीपी की ओर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा, 2023-24 में आर्थिक वृद्धि 8.2 फीसदी थी, जबकि 2024-25 में इसके करीब 0.75 से एक फीसदी तक कम रहने का अनुमान है। हालांकि, भारत में आठ फीसदी की वृद्धि दर हासिल करने की क्षमता है।
अब आगे बढ़ने का समय : गोयल
गोयल ने कहा, हमने खाद्य कीमतों के झटकों का असर देखने के लिए एक साल तक इंतजार किया है। अब आगे बढ़ने का समय है। खाद्य कीमतों के झटके के कारण महंगाई दर आरबीआई के चार फीसदी के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। यहां तक कि ब्याज दर में 0.25 फीसदी की कटौती के साथ भी मौद्रिक नीति महंगाई को लक्ष्य तक लाने की दिशा में अवस्फीतिकारी बनी रहेगी।
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