Home Breaking News Bihar Politics: नई उम्मीद और पुराने साथियों से मिलकर पटना लौट रहे CM नीतीश, शरद यादव रणनीति पर करेंगे काम

Bihar Politics: नई उम्मीद और पुराने साथियों से मिलकर पटना लौट रहे CM नीतीश, शरद यादव रणनीति पर करेंगे काम

0
Bihar Politics: नई उम्मीद और पुराने साथियों से मिलकर पटना लौट रहे CM नीतीश, शरद यादव रणनीति पर करेंगे काम

[ad_1]

ख़बर सुनें

अगले लोकसभा चुनाव के करीब 18 महीने पहले से ही दिल्ली में इसकी आहट ने सुनाई देने लगी है। बिहार में महागठबंधन की सरकार का मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार के दौरे ने न केवल 2024 की अभी से चर्चा छेड़ दी है, बल्कि वह पटना लौटने से पहले भाजपा को डरा कर भी जा रहे हैं। नीतीश कुमार के पटना लौटने से पहले ही भाजपा ने भी लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर अपना होमवर्क तेज कर दिया है। विपक्ष के एक नेता कहते हैं कि अभी नीतीश कुमार कोई प्रधानमंत्री बनने थोड़े ही आए थे, लेकिन भाजपा के नेताओं ने उनके दौरे पर नजर बनाए रखी थी।

दिल्ली दौरे पर क्यों आए मुख्यमंत्री नीतीश?
भाजपा ने नीतीश कुमार के दौरे को उनकी राजनीतिक तीर्थयात्रा बताया है। वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि जब बिहार बाढ़ और सूखे की दोहरी मार झेल रहा है, तब नीतीश कुमार केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए दिल्ली की राजनीतिक तीर्थयात्रा पर हैं। कांग्रेस के एक पूर्व महासचिव कहते हैं कि राजनीति में एक शिष्टाचार भी होता है। इसे नीतीश कुमार भलीभांति समझते हैं। वह कहते हैं कि इस समय राजनीति का माहौल ठीक नहीं है, इसलिए वह मीडिया को बयान नहीं दे रहे हैं। जहां तक नीतीश कुमार के दिल्ली में होने का प्रश्न है तो वह सत्ताधारी दल(भाजपा) का साथ छोड़कर विपक्षी दलों के खेमे में आए हैं। 2017 में उनसे इसी तरह की राजनीतिक भूल हुई थी। मेरे विचार में बिहार में नई सरकार के गठन के बाद वह अपनी भूल सुधार के साथ-साथ विपक्ष के राजनीतिक दलों के नेताओं से मिलने, संवाद बढ़ाने के लिए आए हैं। वह जद(यू) के संस्थापक और बागी हो चुके अपने नेता शरद यादव से भी मिले हैं। नीतीश कुमार ने सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, आम आदमी पार्टी के संयोजक, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, माकपा महासचिव सीताराम येचुरी, भाकपा के डी राजा, भाकपा(माले) के दीपांकर भट्टाचार्य, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, इंडियन नेशनल लोकदल के ओम प्रकाश चौटाला समेत तमाम नेताओं से भेंट की है। कहा भी कि सभी विपक्षी दलों को एक होना चाहिए। सब एक साथ आ जाएंगे तो भाजपा को कोई नहीं पूछेगा।

नीतीश के दौरे का भाजपा पर क्या असर?
नीतीश कुमार ने 2022 में भाजपा का साथ छोडने से पहले राज्य में अगड़ा बनाम पिछड़ा की राजनीतिक लड़ाई का संकेत दे रहे थे। नई सरकार का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने जातिगत आधार पर जनगणना कराने की प्रतिबद्धता दिखाई और अब जनता दल परिवार को एकजुट करने के रास्ते पर हैं। भाजपा की राजनीतिक शैली पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्याम नारायण पांडे कहते हैं कि नीतीश कुमार के प्रयास से भाजपा काफी चौकन्नी दिखाई दे रही है। पांडे के मुताबिक भाजपा ने उ.प्र. में पदाधिकारियों की नियुक्ति जातिगत आधार को देखकर करना शुरू किया है। हाल में संगठन मंत्री और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आए हैं। यह भाजपा की तैयारी को ही बता रहे हैं। 

तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य का भी कहना है कि 2024 की लड़ाई बहुत आसान नहीं है। भाजपा के पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ नेता राजकमल पाठक कहते हैं कि चुनौतियां बढ़ रही हैं। यह कोलकाता में ही नहीं दिल्ली में भी बढ़ रही हैं। हालांकि जद(यू) में ही एक धड़ा ऐसा भी है जो नीतीश कुमार की राजनीति की आलोचना कर रहा है। इसमें पूर्व प्रवक्ता अजय आलोक सरीखे लोग भी हैं। लेकिन एक बहुत बड़ा धड़ा है जो काफी उत्साहित है। शरद यादव के शुभ चिंतक भी इस बदलाव को अच्छा मान रहे हैं। 

उनका कहना है कि 2015 में जद(यू) के शरद यादव ने इसी मुहिम को आगे बढ़ाया था। राजद और जद(यू) करीब आए थे। इसके बाद शरद यादव की कोशिश थी कि उ.प्र. की समाजवादी पार्टी, हरियाणा की इनलो, उड़ीसा की जनता दल(बीजू), कर्नाटक की जनता दल(एस), पंजाब से अकाली दल बादल, जम्मू-कश्मीर से नेशनल कांफ्रेस सब साथ आएं। नीतीश कुमार की दिल्ली यात्रा को उसी दिशा में देखा जा सकता है।

शरद पवार भी बता रहे हैं एकजुट होने का रास्ता
एनसीपी के नेता शरद पवार को विपक्षी एकता का रास्ता न्यूतम साझा कार्यक्रम के माध्यम से नजर आता है। कांग्रेस की सक्रिय राजनीति से हाशिए पर चल रहे एक पूर्व महासचिव का कहना है कि जब भी विभिन्न विचारधाराओं वाला विपक्ष एक मंच पर आएगा, उसे न्यूनतम साझा कार्यक्रम के मूल मंत्र को अपनाना ही पड़ेगा। जद(यू) के एक पूर्व राज्यसभा सदस्य ने नीतीश कुमार से दिल्ली में मिलने का समय मांगा और मिले। 

वह कहते हैं कि बिना कांग्रेस के कोई विपक्षी एकता संभव नहीं है। सूत्र का कहना है कि मुझे और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इसमें कोई भ्रम नहीं है। वह कहते हैं कि बिहार में लोकसभा सीटों के बंटवारे के बाद जद(यू) किसी भी दशा में 15 से अधिक सीट नहीं जीत सकती। इतनी सीटें जीतने वाले दल का मुखिया प्रधानमंत्री बने तो यह नसीब की ही बात होगी। इसी तरह से देश के हर राज्य में फैले विपक्ष के दलों में किसी के पास 40 से अधिक सीटें आना मुश्किल है। किसी भी विपक्षी राजनीतिक दल का दूसरे राज्य में संगठन भी नहीं है। इसलिए कोई भी विपक्षी एकता बिना कांग्रेस की मुख्य भूमिका के संभव नहीं है। इसलिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का दायरा भी बढ़ना तय है।

विस्तार

अगले लोकसभा चुनाव के करीब 18 महीने पहले से ही दिल्ली में इसकी आहट ने सुनाई देने लगी है। बिहार में महागठबंधन की सरकार का मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार के दौरे ने न केवल 2024 की अभी से चर्चा छेड़ दी है, बल्कि वह पटना लौटने से पहले भाजपा को डरा कर भी जा रहे हैं। नीतीश कुमार के पटना लौटने से पहले ही भाजपा ने भी लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर अपना होमवर्क तेज कर दिया है। विपक्ष के एक नेता कहते हैं कि अभी नीतीश कुमार कोई प्रधानमंत्री बनने थोड़े ही आए थे, लेकिन भाजपा के नेताओं ने उनके दौरे पर नजर बनाए रखी थी।

दिल्ली दौरे पर क्यों आए मुख्यमंत्री नीतीश?

भाजपा ने नीतीश कुमार के दौरे को उनकी राजनीतिक तीर्थयात्रा बताया है। वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि जब बिहार बाढ़ और सूखे की दोहरी मार झेल रहा है, तब नीतीश कुमार केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए दिल्ली की राजनीतिक तीर्थयात्रा पर हैं। कांग्रेस के एक पूर्व महासचिव कहते हैं कि राजनीति में एक शिष्टाचार भी होता है। इसे नीतीश कुमार भलीभांति समझते हैं। वह कहते हैं कि इस समय राजनीति का माहौल ठीक नहीं है, इसलिए वह मीडिया को बयान नहीं दे रहे हैं। जहां तक नीतीश कुमार के दिल्ली में होने का प्रश्न है तो वह सत्ताधारी दल(भाजपा) का साथ छोड़कर विपक्षी दलों के खेमे में आए हैं। 2017 में उनसे इसी तरह की राजनीतिक भूल हुई थी। मेरे विचार में बिहार में नई सरकार के गठन के बाद वह अपनी भूल सुधार के साथ-साथ विपक्ष के राजनीतिक दलों के नेताओं से मिलने, संवाद बढ़ाने के लिए आए हैं। वह जद(यू) के संस्थापक और बागी हो चुके अपने नेता शरद यादव से भी मिले हैं। नीतीश कुमार ने सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, आम आदमी पार्टी के संयोजक, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, माकपा महासचिव सीताराम येचुरी, भाकपा के डी राजा, भाकपा(माले) के दीपांकर भट्टाचार्य, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, इंडियन नेशनल लोकदल के ओम प्रकाश चौटाला समेत तमाम नेताओं से भेंट की है। कहा भी कि सभी विपक्षी दलों को एक होना चाहिए। सब एक साथ आ जाएंगे तो भाजपा को कोई नहीं पूछेगा।

नीतीश के दौरे का भाजपा पर क्या असर?

नीतीश कुमार ने 2022 में भाजपा का साथ छोडने से पहले राज्य में अगड़ा बनाम पिछड़ा की राजनीतिक लड़ाई का संकेत दे रहे थे। नई सरकार का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने जातिगत आधार पर जनगणना कराने की प्रतिबद्धता दिखाई और अब जनता दल परिवार को एकजुट करने के रास्ते पर हैं। भाजपा की राजनीतिक शैली पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्याम नारायण पांडे कहते हैं कि नीतीश कुमार के प्रयास से भाजपा काफी चौकन्नी दिखाई दे रही है। पांडे के मुताबिक भाजपा ने उ.प्र. में पदाधिकारियों की नियुक्ति जातिगत आधार को देखकर करना शुरू किया है। हाल में संगठन मंत्री और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आए हैं। यह भाजपा की तैयारी को ही बता रहे हैं। 

तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य का भी कहना है कि 2024 की लड़ाई बहुत आसान नहीं है। भाजपा के पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ नेता राजकमल पाठक कहते हैं कि चुनौतियां बढ़ रही हैं। यह कोलकाता में ही नहीं दिल्ली में भी बढ़ रही हैं। हालांकि जद(यू) में ही एक धड़ा ऐसा भी है जो नीतीश कुमार की राजनीति की आलोचना कर रहा है। इसमें पूर्व प्रवक्ता अजय आलोक सरीखे लोग भी हैं। लेकिन एक बहुत बड़ा धड़ा है जो काफी उत्साहित है। शरद यादव के शुभ चिंतक भी इस बदलाव को अच्छा मान रहे हैं। 

उनका कहना है कि 2015 में जद(यू) के शरद यादव ने इसी मुहिम को आगे बढ़ाया था। राजद और जद(यू) करीब आए थे। इसके बाद शरद यादव की कोशिश थी कि उ.प्र. की समाजवादी पार्टी, हरियाणा की इनलो, उड़ीसा की जनता दल(बीजू), कर्नाटक की जनता दल(एस), पंजाब से अकाली दल बादल, जम्मू-कश्मीर से नेशनल कांफ्रेस सब साथ आएं। नीतीश कुमार की दिल्ली यात्रा को उसी दिशा में देखा जा सकता है।

शरद पवार भी बता रहे हैं एकजुट होने का रास्ता

एनसीपी के नेता शरद पवार को विपक्षी एकता का रास्ता न्यूतम साझा कार्यक्रम के माध्यम से नजर आता है। कांग्रेस की सक्रिय राजनीति से हाशिए पर चल रहे एक पूर्व महासचिव का कहना है कि जब भी विभिन्न विचारधाराओं वाला विपक्ष एक मंच पर आएगा, उसे न्यूनतम साझा कार्यक्रम के मूल मंत्र को अपनाना ही पड़ेगा। जद(यू) के एक पूर्व राज्यसभा सदस्य ने नीतीश कुमार से दिल्ली में मिलने का समय मांगा और मिले। 

वह कहते हैं कि बिना कांग्रेस के कोई विपक्षी एकता संभव नहीं है। सूत्र का कहना है कि मुझे और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इसमें कोई भ्रम नहीं है। वह कहते हैं कि बिहार में लोकसभा सीटों के बंटवारे के बाद जद(यू) किसी भी दशा में 15 से अधिक सीट नहीं जीत सकती। इतनी सीटें जीतने वाले दल का मुखिया प्रधानमंत्री बने तो यह नसीब की ही बात होगी। इसी तरह से देश के हर राज्य में फैले विपक्ष के दलों में किसी के पास 40 से अधिक सीटें आना मुश्किल है। किसी भी विपक्षी राजनीतिक दल का दूसरे राज्य में संगठन भी नहीं है। इसलिए कोई भी विपक्षी एकता बिना कांग्रेस की मुख्य भूमिका के संभव नहीं है। इसलिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का दायरा भी बढ़ना तय है।

[ad_2]

Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here