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कुरुक्षेत्र: विरोधी भी मुलायम से प्यार तो कर सकते हैं, लेकिन नफरत नहीं

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कुरुक्षेत्र: विरोधी भी मुलायम से प्यार तो कर सकते हैं, लेकिन नफरत नहीं

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Mulayam Singh Yadav and PM Modi

Mulayam Singh Yadav and PM Modi
– फोटो : Agency (File Photo)

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मुलायम सिंह यादव के साथ मेरा निजी रिश्ता 1980 के बाद के उन दिनों से था, जब मैं छात्र होता था और मुलायम सिंह जी अकसर कानपुर आते रहते थे। मेरे बड़े भाई और कई करीबी रिश्ते के भाई समाजवादी आंदोलन और लोकदल की राजनीति से जुड़े थे और जिनकी वजह से मुलायम सिंह यादव को मैं करीब से जानने लगा था और उनसे एक अपनापन महसूस होता था। बाद में जब मैं पत्रकारिता में आया तो ये रिश्ता और प्रगाढ़ हो गया। वैचारिक समानता ने इसे और मज़बूत किया जो आख़िर तक बना रहा।

देवीलाल ने की थी सीएम बनने की भविष्यवाणी

नेता जी के साथ मेरे अनगिनत संस्मरण हैं। खट्टे-मीठे दोनों, पर मीठे ज़्यादा हैं खट्टे कम और खट्टे भी ऐसे जिनमें तल्ख़ी नहीं अपनापन होता था। मैं उनसे जो दिल में होता था साफ़-साफ़ कह देता था और वो सब सुन भी लेते थे। कभी जब असहमत होते थे तो किसी बड़े की तरह समझा देते थे। नेता विपक्ष के तौर पर जब उन्होंने उत्तर प्रदेश में क्रांति रथ निकाला, तो मैंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर उसकी रिपोर्टिंग की और तभी मैंने अनुमान लगा लिया था कि ये काफ़ी आगे तक जाएंगे। उन दिनों चौधरी देवीलाल उनकी कुछ जन सभाओं में आए और बुलंदशहर की एक सभा में उन्होंने घोषणा की कि उत्तर प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव होंगे।

उन्होंने मुलायम सिंह यादव का हाथ पकड़कर मंच से ये एलान किया। मैं तब वहीं मंच के पास बनी प्रेस गैलरी में था। मैंने मंच से उतरते वक्त उन्हें बधाई दी, तो बोले अभी बहुत संघर्ष करना है और आप सभी मित्रों का सहयोग भी चाहिए। वे सही थे। उन्हें मुख्यमंत्री बनने के लिए न सिर्फ़ कांग्रेस सरकार से, बल्कि विपक्ष के अपने खेमे के भीतर भी ख़ासा संघर्ष करना पड़ा।

टूटा जाटों-यादवों का गठजोड़

1989 के आम चुनावों के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए उनके और अजित सिंह के बीच कड़ा मुक़ाबला हुआ। जनता दल के तत्कालीन दिग्गजों के चक्रव्यूह को भेद कर मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन इस घटना ने उत्तर प्रदेश में जाटों और यादवों व अन्य पिछड़ों का जो सियासी गठजोड़ चौधरी चरण सिंह ने बनाया था, उसे हमेशा के लिए तोड़ दिया जिसकी भरपाई न मुलायम सिंह न अजित सिंह कभी कर सके और चरण सिंह की विरासत को लेकर उनके अंशज और वैचारिक वारिसों के बीच लड़ाई होती रही।

मुलायम सिंह दो बार विधान सभा का चुनाव 1969 और 1989 में हारे ज़रूर, लेकिन हिम्मत कभी नहीं हारे। उनकी सियासी यात्रा जारी रही। 1977 में उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने रामनरेश यादव राजनीति में वो मुक़ाम हासिल नहीं कर पाए, जो उनके कैबिनेट मंत्री रहे मुलायम सिंह यादव ने हासिल किया। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक ज़मीन में राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति का जो बीज डाला था और चरण सिंह ने किसान राजनीति के ज़रिए उसे जो खाद-पानी दिया था मुलायम सिंह यादव उसकी सियासी फसल थे।

जनता पार्टी टूटने के बाद पिछड़ों की राजनीति को आगे ले जाने का जो काम रामनरेश यादव को करना चाहिए था, उसे मुलायम सिंह यादव ने किया। मंडल के बाद उन्होंने केंद्र की वीपी सिंह सरकार को गिराने में चंद्रशेखर देवीलाल का साथ दिया, लेकिन उत्तर प्रदेश में मंडल मसीहा भी वही बने और बाबरी मस्जिद पर अपनी सरकार क़ुर्बान करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह के सेक्युलर कार्ड को भी उन्होंने बाबरी मस्जिद की हिफाजत के लिए उग्र कारसेवकों पर गोली चलवा कर अपने मुक़ाबले कमजोर कर दिया।

…जब लालू पीएम की कु्र्सी के बीच में खड़े थे

वे भाजपा की राजनीति और संघ की विचारधारा के कट्टर विरोधी रहे, लेकिन भाजपा नेताओं और संघ नेतृत्व को प्रिय भी थे। कल्याण सिंह से उनकी दोस्ती ने कल्याण को दो बार भाजपा से अलग करवा दिया। अटल, आडवाणी, जोशी, राजनाथ से लेकर नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ तक मुलायम के प्रति प्रेम और आदर भाव से भरे रहे। लालू प्रसाद यादव उनके प्रतिद्वंदी भी थे और संबंधी भी। 1997 में जब लालू उनके प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में दीवार बन कर खड़े हो गए, उसका मलाल मुलायम को बहुत रहा। इसका ज़िक्र उन्होंने मुझसे भी किया था।

वादे और इरादे के धनी मुलायम सिंह यादव ने पहलवानी के दौरान जो चरखा-दांव सीखा था उसका राजनीति के अखाड़े में भी कई बार प्रयोग किया और कई दिग्गजों को चित्त किया। चाहे वे एक वोट से अटल सरकार गिरने के बाद सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकना हो या वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बाद मनमोहन सरकार को बचाना हो। भारतीय राजनीति में मुलायम के ऐसे सियासी पैंतरों के क़िस्से भरे पड़े हैं।

देर रात सुनते थे शिकायतें

प्रदेश और देश की राजनीति में अपनी तमाम व्यस्तता के बावजूद मुलायम सिंह यादव अपने समर्थकों और क्षेत्र के लोगों से मिलने उनकी शिकायतें समस्याएं सुन कर उनका समाधान निकालने का वक्त निकाल लेते थे। ऐसा अक्सर वह रात में दस बजे के बाद सारे सरकारी और पार्टी के काम निपटाने के बाद करते थे। लखनऊ में अकसर उनके घर पर सैकड़ों लोग सैफई, इटावा और आसपास के गांवों से आकर उनसे अपनी निजी समस्याएं सुनाने को आते थे और नेता जी से मिलने के बाद खुश होकर लौटते थे। नेता जी की इन बैठकों में आने वाले अपने पारिवारिक झगड़ों, पड़ोसी से विवाद, सास-बहू के झगड़े, बीमारी, बच्चों की पढ़ाई, बेटी की शादी की अड़चन, बेटी का ससुराल से विवाद जैसी समस्याओं पर नेता जी से फैसला करवाते थे और उसे ख़ुशी-ख़ुशी मानते थे। आज कितने नेता अपनी जड़ों से इस तरह जुड़े रहते हैं। मुलायम सिंह यादव ऐसे ही धरती पुत्र नहीं कहलाते थे।

चमत्कारी थे मुलायम सिंह के प्रयोग

मुलायम सिंह यादव पर भले ही परिवारवाद, कॉरपोरेट मैत्री, सैफई, समाजवाद जैसे आरोप लगते रहे हों और इनमें तथ्यात्मकता भी है लेकिन ये भी सच है कि समाजवादी आंदोलन बिखरने, जनता पार्टी और जनता दल के प्रयोगों की विफलता के बाद बिखरे निराश समाजवादियों और किसान राजनीति के लोकदली नेताओं-कार्यकर्ताओं को मुलायम के समाजवादी पार्टी के प्रयोग ने बड़ा सहारा दिया। लोहिया, जेपी, लिमये, चरण सिंह, राजनारायण के नाम राजनीतिक विमर्श में बने रहे। मुलायम ने एक तरफ़ अगर अमर सिंह, अनिल अंबानी, जया बच्चन, संजय डालमिया को राज्यसभा भेजा तो दूसरी तरफ़ जनेश्वर मिश्र ब्रजभूषण तिवारी मोहन सिंह जैसे कई धुर समाजवादी सांसद बने।

राजनीति दागी और बाहुबली अपराधियों को आगे लाने और उन्हें महिमा मंडित करने का दोष मुलायम सिंह को दिया जाता रहा है। लेकिन राजनीति के अपराधीकरण प्रक्रिया मुलायम से पहले शुरू हो चुकी थी। बाहुबली और आपराधिक मुक़दमों में आरोपित बाहुबली हरिशंकर तिवारी वीरेंद्र शाही जैसे नेताओं को मुलायम राजनीति में नहीं लाये थे। फूलन देवी से पहले तहसीलदार सिंह को खुद मुलायम सिंह के ख़िलाफ़ भाजपा ने उम्मीदवार बनाया था। राजनीति के मुलायम युग में इसका विस्तार हुआ ये चलन आज नए आयाम पा चुका है। राजनीति में जिन बाहुबलियों को मुलायम की देन माना जाता है, उनमें कई दूसरे दलों की गंगा नहा चुके हैं और प्रतिष्ठित हो चुके हैं।

कुल मिलाकर मुलायम सिंह यादव भारतीय राजनीति के ऐसे नेता रहे, जिनसे उनके समर्थकों में प्यार का जुनून पैदा होता है, तो विरोधी भी उनसे प्यार तो कर सकते हैं, लेकिन नफरत नहीं कर सकते।

विस्तार

मुलायम सिंह यादव के साथ मेरा निजी रिश्ता 1980 के बाद के उन दिनों से था, जब मैं छात्र होता था और मुलायम सिंह जी अकसर कानपुर आते रहते थे। मेरे बड़े भाई और कई करीबी रिश्ते के भाई समाजवादी आंदोलन और लोकदल की राजनीति से जुड़े थे और जिनकी वजह से मुलायम सिंह यादव को मैं करीब से जानने लगा था और उनसे एक अपनापन महसूस होता था। बाद में जब मैं पत्रकारिता में आया तो ये रिश्ता और प्रगाढ़ हो गया। वैचारिक समानता ने इसे और मज़बूत किया जो आख़िर तक बना रहा।

देवीलाल ने की थी सीएम बनने की भविष्यवाणी

नेता जी के साथ मेरे अनगिनत संस्मरण हैं। खट्टे-मीठे दोनों, पर मीठे ज़्यादा हैं खट्टे कम और खट्टे भी ऐसे जिनमें तल्ख़ी नहीं अपनापन होता था। मैं उनसे जो दिल में होता था साफ़-साफ़ कह देता था और वो सब सुन भी लेते थे। कभी जब असहमत होते थे तो किसी बड़े की तरह समझा देते थे। नेता विपक्ष के तौर पर जब उन्होंने उत्तर प्रदेश में क्रांति रथ निकाला, तो मैंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर उसकी रिपोर्टिंग की और तभी मैंने अनुमान लगा लिया था कि ये काफ़ी आगे तक जाएंगे। उन दिनों चौधरी देवीलाल उनकी कुछ जन सभाओं में आए और बुलंदशहर की एक सभा में उन्होंने घोषणा की कि उत्तर प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव होंगे।

उन्होंने मुलायम सिंह यादव का हाथ पकड़कर मंच से ये एलान किया। मैं तब वहीं मंच के पास बनी प्रेस गैलरी में था। मैंने मंच से उतरते वक्त उन्हें बधाई दी, तो बोले अभी बहुत संघर्ष करना है और आप सभी मित्रों का सहयोग भी चाहिए। वे सही थे। उन्हें मुख्यमंत्री बनने के लिए न सिर्फ़ कांग्रेस सरकार से, बल्कि विपक्ष के अपने खेमे के भीतर भी ख़ासा संघर्ष करना पड़ा।

टूटा जाटों-यादवों का गठजोड़

1989 के आम चुनावों के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए उनके और अजित सिंह के बीच कड़ा मुक़ाबला हुआ। जनता दल के तत्कालीन दिग्गजों के चक्रव्यूह को भेद कर मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन इस घटना ने उत्तर प्रदेश में जाटों और यादवों व अन्य पिछड़ों का जो सियासी गठजोड़ चौधरी चरण सिंह ने बनाया था, उसे हमेशा के लिए तोड़ दिया जिसकी भरपाई न मुलायम सिंह न अजित सिंह कभी कर सके और चरण सिंह की विरासत को लेकर उनके अंशज और वैचारिक वारिसों के बीच लड़ाई होती रही।

मुलायम सिंह दो बार विधान सभा का चुनाव 1969 और 1989 में हारे ज़रूर, लेकिन हिम्मत कभी नहीं हारे। उनकी सियासी यात्रा जारी रही। 1977 में उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने रामनरेश यादव राजनीति में वो मुक़ाम हासिल नहीं कर पाए, जो उनके कैबिनेट मंत्री रहे मुलायम सिंह यादव ने हासिल किया। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक ज़मीन में राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति का जो बीज डाला था और चरण सिंह ने किसान राजनीति के ज़रिए उसे जो खाद-पानी दिया था मुलायम सिंह यादव उसकी सियासी फसल थे।

जनता पार्टी टूटने के बाद पिछड़ों की राजनीति को आगे ले जाने का जो काम रामनरेश यादव को करना चाहिए था, उसे मुलायम सिंह यादव ने किया। मंडल के बाद उन्होंने केंद्र की वीपी सिंह सरकार को गिराने में चंद्रशेखर देवीलाल का साथ दिया, लेकिन उत्तर प्रदेश में मंडल मसीहा भी वही बने और बाबरी मस्जिद पर अपनी सरकार क़ुर्बान करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह के सेक्युलर कार्ड को भी उन्होंने बाबरी मस्जिद की हिफाजत के लिए उग्र कारसेवकों पर गोली चलवा कर अपने मुक़ाबले कमजोर कर दिया।

…जब लालू पीएम की कु्र्सी के बीच में खड़े थे

वे भाजपा की राजनीति और संघ की विचारधारा के कट्टर विरोधी रहे, लेकिन भाजपा नेताओं और संघ नेतृत्व को प्रिय भी थे। कल्याण सिंह से उनकी दोस्ती ने कल्याण को दो बार भाजपा से अलग करवा दिया। अटल, आडवाणी, जोशी, राजनाथ से लेकर नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ तक मुलायम के प्रति प्रेम और आदर भाव से भरे रहे। लालू प्रसाद यादव उनके प्रतिद्वंदी भी थे और संबंधी भी। 1997 में जब लालू उनके प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में दीवार बन कर खड़े हो गए, उसका मलाल मुलायम को बहुत रहा। इसका ज़िक्र उन्होंने मुझसे भी किया था।

वादे और इरादे के धनी मुलायम सिंह यादव ने पहलवानी के दौरान जो चरखा-दांव सीखा था उसका राजनीति के अखाड़े में भी कई बार प्रयोग किया और कई दिग्गजों को चित्त किया। चाहे वे एक वोट से अटल सरकार गिरने के बाद सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकना हो या वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बाद मनमोहन सरकार को बचाना हो। भारतीय राजनीति में मुलायम के ऐसे सियासी पैंतरों के क़िस्से भरे पड़े हैं।

देर रात सुनते थे शिकायतें

प्रदेश और देश की राजनीति में अपनी तमाम व्यस्तता के बावजूद मुलायम सिंह यादव अपने समर्थकों और क्षेत्र के लोगों से मिलने उनकी शिकायतें समस्याएं सुन कर उनका समाधान निकालने का वक्त निकाल लेते थे। ऐसा अक्सर वह रात में दस बजे के बाद सारे सरकारी और पार्टी के काम निपटाने के बाद करते थे। लखनऊ में अकसर उनके घर पर सैकड़ों लोग सैफई, इटावा और आसपास के गांवों से आकर उनसे अपनी निजी समस्याएं सुनाने को आते थे और नेता जी से मिलने के बाद खुश होकर लौटते थे। नेता जी की इन बैठकों में आने वाले अपने पारिवारिक झगड़ों, पड़ोसी से विवाद, सास-बहू के झगड़े, बीमारी, बच्चों की पढ़ाई, बेटी की शादी की अड़चन, बेटी का ससुराल से विवाद जैसी समस्याओं पर नेता जी से फैसला करवाते थे और उसे ख़ुशी-ख़ुशी मानते थे। आज कितने नेता अपनी जड़ों से इस तरह जुड़े रहते हैं। मुलायम सिंह यादव ऐसे ही धरती पुत्र नहीं कहलाते थे।

चमत्कारी थे मुलायम सिंह के प्रयोग

मुलायम सिंह यादव पर भले ही परिवारवाद, कॉरपोरेट मैत्री, सैफई, समाजवाद जैसे आरोप लगते रहे हों और इनमें तथ्यात्मकता भी है लेकिन ये भी सच है कि समाजवादी आंदोलन बिखरने, जनता पार्टी और जनता दल के प्रयोगों की विफलता के बाद बिखरे निराश समाजवादियों और किसान राजनीति के लोकदली नेताओं-कार्यकर्ताओं को मुलायम के समाजवादी पार्टी के प्रयोग ने बड़ा सहारा दिया। लोहिया, जेपी, लिमये, चरण सिंह, राजनारायण के नाम राजनीतिक विमर्श में बने रहे। मुलायम ने एक तरफ़ अगर अमर सिंह, अनिल अंबानी, जया बच्चन, संजय डालमिया को राज्यसभा भेजा तो दूसरी तरफ़ जनेश्वर मिश्र ब्रजभूषण तिवारी मोहन सिंह जैसे कई धुर समाजवादी सांसद बने।

राजनीति दागी और बाहुबली अपराधियों को आगे लाने और उन्हें महिमा मंडित करने का दोष मुलायम सिंह को दिया जाता रहा है। लेकिन राजनीति के अपराधीकरण प्रक्रिया मुलायम से पहले शुरू हो चुकी थी। बाहुबली और आपराधिक मुक़दमों में आरोपित बाहुबली हरिशंकर तिवारी वीरेंद्र शाही जैसे नेताओं को मुलायम राजनीति में नहीं लाये थे। फूलन देवी से पहले तहसीलदार सिंह को खुद मुलायम सिंह के ख़िलाफ़ भाजपा ने उम्मीदवार बनाया था। राजनीति के मुलायम युग में इसका विस्तार हुआ ये चलन आज नए आयाम पा चुका है। राजनीति में जिन बाहुबलियों को मुलायम की देन माना जाता है, उनमें कई दूसरे दलों की गंगा नहा चुके हैं और प्रतिष्ठित हो चुके हैं।

कुल मिलाकर मुलायम सिंह यादव भारतीय राजनीति के ऐसे नेता रहे, जिनसे उनके समर्थकों में प्यार का जुनून पैदा होता है, तो विरोधी भी उनसे प्यार तो कर सकते हैं, लेकिन नफरत नहीं कर सकते।



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