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आईसीआईसीआई बैंक।
– फोटो : सोशल मीडिया
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फ्लोटिंग ब्याज दरों में किसी भी बदलाव की जानकारी हर ग्राहक को देने के लिए बैंक बाध्य नहीं हैं। क्योंकि, कर्जदार जब बैंकों के साथ कर्ज एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करते हैं, उसी समय वे ऐसी किसी भी वृद्धि या कमी के लिए सहमत होते हैं।
राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि बैंक की वेबसाइट की सूचना को ही नोटिस माना जाएगा। एनसीडीआरसी के पीठासीन सदस्य दिनेश सिंह और सदस्य करुणा नंद वाजपेयी ने इस मामले में उपभोक्ता अदालत के एक आदेश को रद्द कर दिया।
आईसीआईसीआई बैंक बनाम विष्णु बंसल मामले में एनसीडीआरसी ने कहा कि बैंक ने संबंधित सूचनाओं को अपनी वेबसाइट पर रखने की तारीखों और शिकायतकर्ता को पत्र भेजने की तारीखों की भी जानकारी दी। भले ही मामला 2006 से 2008 की अवधि से संबंधित हों। बैंक ने आयोग को बताया कि वह शिकायतकर्ता को सेवा भाव के रूप में एक लाख का भुगतान करने के लिए भी तैयार था। राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम ने राज्य आयोग को बैंक द्वारा जमा कराई गई राशि शिकायतकर्ता को ब्याज सहित जारी करने का निर्देश दिया। आयोग के आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।
बैंक के खिलाफ आया था आयोग का फैसला
मई, 2021 में दिल्ली उपभोक्ता आयोग के आदेश के खिलाफ आईसीआईसीआई बैंक की अपील पर आए फैसले में कहा गया था कि बैंक कर्जदारों की सहमति के बिना होम लोन की ब्याज दरों में बदलाव नहीं कर सकते हैं।
- स्टेट फोरम ने यह भी अनिवार्य कर दिया था कि जब भी फ्लोटिंग रेट के तहत होम लोन की ब्याज दरों में बदलाव किया जा रहा हो तो बैंकों को ग्राहकों की सहमति लेनी जरूरी है।
- आईसीआईसीआई बैंक ने राष्ट्रीय फोरम में तर्क दिया कि ब्याज दर और किस्तों की संख्या उस कर्ज पर बढ़ाई गई थी जो फ्लोटिंग दर पर था। शिकायतकर्ता ने एग्रीमेंट को पढ़ने और सहमति देने के बाद हस्ताक्षर किए थे। यह नियम सभी कर्जदारों पर लागू हुआ था। शिकायतकर्ता ने कहा उसे अगर यह पता होता तो वह कर्ज को दूसरे बैंक में स्थानांतरित कर देता।
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