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COP 15: भारत में जैव विविधता की रक्षा के लिए DSI से मिलेगा सहयोग, विकासशील देशों को हर साल 30 अरब डॉलर

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COP 15: भारत में जैव विविधता की रक्षा के लिए DSI से मिलेगा सहयोग, विकासशील देशों को हर साल 30 अरब डॉलर

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कॉप( सांकेतिक तस्वीर)

कॉप( सांकेतिक तस्वीर)
– फोटो : सोशल मीडिया

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कॉप-15 सम्मेलन में जैव विविधता की रक्षा के लिए हुए ऐतिहासिक समझौते के तौर पर अपनाए गए ‘डिजिटल सिक्वेंस इंफोर्मेशन’ (डीएसआई) से प्रकृति के संरक्षण के लिए भारत जैसे देशों को धन मुहैया होगा। सोमवार को हुए इस ऐतिहासिक समझौते के तहत विकासशील देशों को हर साल 30 अरब डॉलर मिलेंगे।

कनाडा के मॉन्ट्रियल में जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र की संधि के लिए पक्षकारों के सम्मेलन की 15वीं बैठक (कॉप-15) जारी है। जैव विविधता से संबंधित नागोया प्रोटोकॉल के जरिये संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन का मकसद उपयोगकर्ताओं (कॉरपोरेट संस्थानों) तथा विकासशील देशों में इन संसाधनों का संरक्षण कर रहे स्वदेशी समुदाय व किसानों के बीच आनुवंशिक संसाधनों से पैदा हुए फायदों को वितरित करना है। अब डीएसआई तकनीक से कंपनियां संसाधनों को हासिल करने के लिए आनुवंशिक इंजीनियरिंग के जरिये आनुवंशिक संसाधनों के न्यूक्लियोटाइड सिक्वेंस का इस्तेमाल कर सकती हैं। कॉप-15 में विकासशील देशों ने कहा है कि डीएसआई से मिलने वाले फायदों को समान रूप से साझा किया जाना चाहिए। इसका उपयोग वैश्विक नीति मंचों के संदर्भ में जैविक विविधता व आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त डाटा को संदर्भित करने के लिए किया जाता है।

भारत को मिलना चाहिए लाभ
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) के सचिव जस्टिन मोहन ने कहा कि देशों ने डीएसआई को संसाधनों तक पहुंचने और फायदे साझा करने के तंत्र में लाने पर स्वीकृति दी थी। एक कार्यकारी समूह इन फायदों को साझा करने पर काम करेगा और तुर्किये में अगले सीओपी में इन सिफारिशों को अपनाने की उम्मीद है। उन्होंने कहा, कई प्रजातियां किसी खास क्षेत्र में ही होती हैं, जैसे-औषधीय गुणों वाला लाल चंदन प्राकृतिक रूप से भारत में ही पाया जाता है। इसलिए डीएसआई से अर्जित होने वाली निधि भारत को मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा, भारत यह दलील देता रहा है कि जहां भी जैविक संसाधन का स्रोत पता हो और उसे हासिल करने में कोई समस्या न हो तो डीएसआई से अर्जित निधि मूल देश में ही जानी चाहिए।

विस्तार

कॉप-15 सम्मेलन में जैव विविधता की रक्षा के लिए हुए ऐतिहासिक समझौते के तौर पर अपनाए गए ‘डिजिटल सिक्वेंस इंफोर्मेशन’ (डीएसआई) से प्रकृति के संरक्षण के लिए भारत जैसे देशों को धन मुहैया होगा। सोमवार को हुए इस ऐतिहासिक समझौते के तहत विकासशील देशों को हर साल 30 अरब डॉलर मिलेंगे।

कनाडा के मॉन्ट्रियल में जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र की संधि के लिए पक्षकारों के सम्मेलन की 15वीं बैठक (कॉप-15) जारी है। जैव विविधता से संबंधित नागोया प्रोटोकॉल के जरिये संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन का मकसद उपयोगकर्ताओं (कॉरपोरेट संस्थानों) तथा विकासशील देशों में इन संसाधनों का संरक्षण कर रहे स्वदेशी समुदाय व किसानों के बीच आनुवंशिक संसाधनों से पैदा हुए फायदों को वितरित करना है। अब डीएसआई तकनीक से कंपनियां संसाधनों को हासिल करने के लिए आनुवंशिक इंजीनियरिंग के जरिये आनुवंशिक संसाधनों के न्यूक्लियोटाइड सिक्वेंस का इस्तेमाल कर सकती हैं। कॉप-15 में विकासशील देशों ने कहा है कि डीएसआई से मिलने वाले फायदों को समान रूप से साझा किया जाना चाहिए। इसका उपयोग वैश्विक नीति मंचों के संदर्भ में जैविक विविधता व आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त डाटा को संदर्भित करने के लिए किया जाता है।

भारत को मिलना चाहिए लाभ

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) के सचिव जस्टिन मोहन ने कहा कि देशों ने डीएसआई को संसाधनों तक पहुंचने और फायदे साझा करने के तंत्र में लाने पर स्वीकृति दी थी। एक कार्यकारी समूह इन फायदों को साझा करने पर काम करेगा और तुर्किये में अगले सीओपी में इन सिफारिशों को अपनाने की उम्मीद है। उन्होंने कहा, कई प्रजातियां किसी खास क्षेत्र में ही होती हैं, जैसे-औषधीय गुणों वाला लाल चंदन प्राकृतिक रूप से भारत में ही पाया जाता है। इसलिए डीएसआई से अर्जित होने वाली निधि भारत को मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा, भारत यह दलील देता रहा है कि जहां भी जैविक संसाधन का स्रोत पता हो और उसे हासिल करने में कोई समस्या न हो तो डीएसआई से अर्जित निधि मूल देश में ही जानी चाहिए।



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