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नीतीश कुमार।
– फोटो : Amar Ujala
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महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘शराब आत्मा और शरीर दोनों का विनाश कर देती है।’ इसी तर्क के साथ बापू ने शराब का हमेशा विरोध किया। लेकिन नीतीश कुमार भले ही बापू के रास्ते पर चलना चाहते हों पर बापू हैं नहीं। तभी शराबबंदी के असफल होने पर कह देते हैं कि ‘पियोगे तो मरोगे है ही’।
नीतीश ‘सुशासन’ बाबू के इस कथन से सरोकार की भावना कम और जिद की झलक ज्यादा दिखती है। शराबबंदी पर विपक्ष, मीडिया या जनता सवाल करे तो सुशासन बाबू भड़क भी जाते हैं। इतना ही नहीं सीएम नीतीश बाबू तो इस पर भी अड़ गए हैं कि जो गरीब फर्जी शराब पीने से अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं उन्हें किसी भी तरह का मुआवजा नहीं दिया जाएगा।
छपरा में दर्जनों घरों के कई ऐसे लोग जहरीली शराब का इस बार शिकार हुए हैं जो परिवार के कमाने वाले पूत थे। अब जबकि कोई राहत नीतीश की महागठबंधन सरकार नहीं देगी तो आने वाले दिनों में कई बच्चों, बीवियों, बहनों और माताओं को जीवन-यापन के लाले पड़ जाएंगे।
नीतीश कुमार का हठ-योग
दरअसल, इन दिनों नीतीश कुमार हठ-योग के जरिए अपनी सियासी तबीयत सुधारने में लगे हैं। इसे हठ ही कहा जाएगा कि सरकारी बाबू, सफेदपोश नेताओं और खाकी वर्दीधारियों की मिलीभगत के कारण ही बिहार जैसे राज्य में शराबबंदी सामाजिक तौर पर सफल नहीं हो पा रही है।
2016 से शुरू हुए शराब बैन में पहले साल के छोड़ दें तो लगातार अवैध और फर्जी शराब बनने, बिकने और मिलने की खबरें आती ही रहती हैं। कभी भी ऐसा नहीं लगा कि शराबबंदी कर के सुशासन बाबू ने राज्य में सुशासन की कोई नई इबारत लिखी हो। हुआ बिल्कुल उलटा ही। रेत-माफिया तो अब कल की बात हो गई लेकिन उसी तर्ज पर बिहार में शराब माफिया पनप चुके हैं। न-न करते हुए भी करीब साठ-सत्तर हजार करोड़ की एक नई इंडस्ट्री राज्य में गैरकानूनी तरीके से चल रही है। क्योंकि इसमें बहुत बड़े पैमाने पर राज्य की ब्यूरोक्रेसी से लेकर नेता तक शामिल हैं, इसलिए बड़े पैमाने पर पूर्ण रोकथाम की कार्रवाई नहीं होती।
अगर समय रहते राज्य पुलिस के अधिकारी कठोर से शराबबंदी के कानून को अमल में ला रहे होते तो किसकी मजाल थी कि वो अवैध तो छोड़िए फर्जी शराब बनाकर बेच पाता? नीतीश के मंत्री तो यहां तक तर्क दे रहे हैं कि पड़ोसी राज्यों से उनके राज्य में शराब भेजी जाती है तो भई आपकी पुलिस इन तस्करों को पकड़ती क्यों नहीं?
आखिरकार ये तस्कर बिहार के ख़ाकी धारियों से डरते क्यों नहीं हैं? ये किसकी नाकामी है? क्या यही सुशासन है? क्या ऐसी अधकचरी और लिजलिजी सोच के साथ ही नीतीश बाबू ने शराबबंदी लागू कर दी थी?
निरीह और मासूम, गांवों में काम कर रहे भाड़े के मजदूर और झुग्गियों में रहने वाले गरीब को ही ज्यादातर मामलों में जान से हाथ धोना पड़ता है, क्योंकि शराबबंदी के बावजूद पन्नियों और थैलियों में भरी कच्ची, फर्जी और सस्ती सी शराब आसानी से घर बैठे मिल जा रही है। या कहिए कि इन ‘बेचारों’ को लील जा रही है।
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