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भारत सरकार के 18वें मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी अनंत नागेश्वरन।
– फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) डॉ. वी अनंत नागेश्वरन का मानना है कि अर्थव्यवस्था सुनहरे दौर से गुजर रही है। खासकर, तब जब वैश्विक हालात अच्छे नहीं हैं। इस दौरान हमने सरकार की तमाम योजनाओं और कोशिशों का परिणाम देखा है। आगे भी हमारी योजना इसी तरह की रहेगी।
- भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में मेरा विश्वास काफी हद तक इस तथ्य के कारण है कि बैंक अच्छी स्थिति में आकर अब कर्ज देने लगे हैं। कंपनियों ने भी अपनी बैलेंस शीट में सुधार किया है।
- अगर विकसित देशों में मंदी है, तो भारत के लिए नकारात्मक से अधिक सकारात्मक बातें होंगी।
- अमेरिका इस साल ब्याज दरें बढ़ाता है तो भी रुपये पर पिछले साल की तरह दबाव नहीं होगा।
2023-24 के बजट में सामाजिक क्षेत्र के आवंटन में कटौती की गई है, इसका प्रभाव किस तरह से पड़ेगा?
यह हर तबके के लिए संतुलित बजट है। बजट में आपको कई चीजों में संतुलन बिठाना पड़ता है। ये सरकार पिछले कई वर्षों से संतुलन का काम अच्छे से कर रही है। 2014-15 के बाद से हमारे बैंक विभिन्न मुश्किलों से जूझ रहे थे। एनपीए में फंसे थे। इसलिए उन्हें फिर से पूंजी देनी पड़ी। भारतीय कंपनियां निवेश नहीं कर रही थीं क्योंकि उनके पास भी बैलेंस शीट की समस्या थी। ऐसे मुश्किल हालात में अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए सरकार को निवेश करना पड़ा।
अब सवाल उठ सकता है कि सरकार को निवेश क्यों करना चाहिए? इसलिए नहीं कि इससे सिर्फ नए हवाईअड्डे, नई सड़कें और नए पुल बनते हैं, बल्कि इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि रोजगार पैदा होते हैं। अगर आप इसका सबूत देखना चाहें तो इसमें समस्या यह है कि सरकार इन सभी क्षेत्रों में निवेश तो कर रही है, पर अगर निजी क्षेत्र अब भी मुश्किल में है, तो आपको सरकारी निवेश का असर नहीं दिखेगा।
मान लें कि आप दो लोग दो व्यवसाय चला रहे हैं। मैं आपके व्यवसाय में निवेश करता हूं और दुनिया को यह बताता हूं कि आपकी फर्म 200 लोगों को काम पर रखेगी। अब मान लें कि आपका काम अच्छा नहीं चला और आपकी फर्म ने 100 लोगों को नौकरी से निकाल दिया तो रोजगार सृजन केवल 100 होगा। इस तरह, अगर देखें तो 200 नौकरियां पैदा हुईं, लेकिन 100 लोगों की छंटनी की वजह से सिर्फ 100 नए रोजगार ही पैदा हुए।
मेरा कहना है कि सरकारी खर्च से नौकरियां पैदा हुईं। अर्थव्यवस्था में अन्य चीजें भी हो रही थीं। निजी क्षेत्र की तरह रियल एस्टेट, कंस्ट्रक्शन क्षेत्र…सब मुश्किल दौर में थे। हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों की हालत पतली थी। आईएलएंडएफएस डूब गई और फिर महामारी आ गई। इस दौरान हमने करोड़ों लोगों का टीकाकरण पूरा कर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का काम किया। इसके बाद पिछले साल कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं। खाद के दाम बढ़े। दुनियाभर में ब्याज दरें बढ़नी शुरू हो गईं। ऐसे माहौल में सरकार के निवेश से कुछ हद तक भरपाई होती है। लेकिन सोचिए, अगर सरकार ने निवेश नहीं किया होता, तो ऐसे नकारात्मक घटनाक्रम के दौर में कितना बुरा असर होता। सरकार ने स्थिति को बद से बदतर होने से बचाया। कई उपाय किए। कई योजनाएं लागू कीं। अर्थव्यवस्था में जान फूंकी।
इस बजट में मनरेगा के लिए आवंटन कम क्यों किया गया?
इसका जवाब वित्त मंत्री दे चुकी हैं। मैं भी फिर से कहना चाहूंगा कि ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार ग्रामीण इलाकों में किफायती घर बनाने जा रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना में आवंटन बढ़ा है। पेयजल मिशन हो या जल जीवन मिशन, इनका भी आवंटन बढ़ा है। ये परियोजनाएं पर्याप्त लेबर के बिना लागू नहीं हो सकतीं। हमें लगता है कि ऐसी योजनाओं से ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा। अर्थव्यवस्था में भी सुधार हो रहा है। गांव के लोग वापस शहर जाएंगे तो नौकरी भी पाएंगे। यदि इनसे नौकरियां पैदा नहीं होती हैं और अधिक लोग मनरेगा से भुगतान चाहते हैं, तो उन्हें यह भी दिया जाएगा।
बैंक अब ज्यादा कर्ज दे रहे हैं। आपको क्या लगता है?
आर्थिक सर्वे में हमने कहा है कि भारत इस दशक में 2030 तक अच्छा काम करेगा क्योंकि बैंकों की बैलेंस शीट बहुत अच्छी है। 2020 के पिछले दशक तक महामारी आने से पहले हमारे बैंक बैलेंस शीट की समस्या से जूझ रहे थे। उस अवधि में बैंकों ने बहुत उधार बांटकर एनपीए बढ़ा दिया था। लेकिन, ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में होता है। इसलिए, भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में मेरा विश्वास काफी हद तक इस तथ्य के कारण है कि बैंक अच्छी स्थिति में आकर अब कर्ज देने लगे हैं। कंपनियों ने भी अपनी बैलेंस शीट में सुधार किया है। कॉरपोरेट, बैंकिंग और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां…ये तीनों क्षेत्र पिछले दशक में संकट में थे क्योंकि उन्होंने पूर्व के दशक में अधिक कर्ज लिया था और अधिक उधार भी बांटे थे। पहले दशक में आपने अधिक खाया। दूसरे दशक में उसे पचाया और तीसरे दशक में आप फिर उसे आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं।
20 साल में अर्थव्यवस्था किस तरह से बदली है और अगले 5 से 10 साल में किस तरह से बदलेगी?
हमने अपनी अर्थव्यवस्था खोली है। इसका अर्थ है कि हम दुनिया के लिए खुले हैं और प्रभावित कर रहे हैं। यह बड़ा बदलाव है। सेवा क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी 20 वर्षों में बहुत अधिक रही है। मुझे लगता है कि भारत मैन्युफैक्चरिंग पावर हाउस बनेगा। जीडीपी में इसका हिस्सा बढ़ेगा और यह बड़ा बदलाव होगा। लेकिन, किसी भी तरह से कृषि का महत्व कम नहीं होगा। मुझे लगता है कि कृषि, मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं के बीच आगे जाकर बेहतर संतुलन होगा।
हिंडनबर्ग रिपोर्ट मामले में अर्थव्यवस्था पर कितना प्रभाव पड़ सकता है?
मुझे नहीं लगता, एक समूह में जो हो रहा है, उससे सरकार के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने की योजना प्रभावित होगी।
रुपये में नरमी के बीच विदेशी मुद्रा भंडार के मोर्चे पर हमारी स्थिति कैसी है?
विदेशी मुद्रा भंडार के मोर्चे पर देश अच्छी स्थिति में है। हमारे पास 10 माह से अधिक के आयात के लिए डॉलर का पर्याप्त भंडार है। इसलिए, मुझे लगता है कि हम काफी संतुलित स्थिति में हैं। अमेरिकी ब्याज दरें इस साल बढ़ सकती हैं, तो भी मुझे नहीं लगता कि रुपये पर पिछले साल की तरह कोई दबाव होगा।
5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था में कौन सा क्षेत्र ज्यादा योगदान देगा?
विनिर्माण क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हम अर्थव्यवस्था में विनिर्माण के योगदान को बढ़ाने के लिए काफी कुछ कर रहे हैं। सरकार 14 क्षेत्रों को उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के तहत प्रोत्साहन दे रही है। बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के प्रयासों के तहत रेल, सड़क, हवाईअड्डे और बंदरगाह आदि बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा, देश में बिजली की उपलब्धता ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में बेहतर हुई है क्योंकि बिजली की निरंतर आपूर्ति विनिर्माण के लिए महत्वपूर्ण है। औद्योगिक विकास भी बड़ी भूमिका निभाएगा। अब हम निर्यात के लिए पर्याप्त कृषि उत्पाद पैदा कर रहे हैं। कृषि उत्पादकता और कृषि निर्यात का भी बड़ा योगदान होगा।
मंदी ने यूरोप को किस तरह प्रभावित किया है और भारतीय उद्योग को किस तरह से प्रभावित करेगी?
इस समय कोई मंदी नहीं है। अगर मंदी आती है तो अपने साथ कुछ अच्छी चीजें भी ला सकती है। क्रूड के दाम घटेंगे। अमेरिका ब्याज दरें बढ़ाना बंद कर देगा। डॉलर कमजोर हो जाएगा। इस तरह, कई मायनों में अगर विकसित देशों में मंदी आती है, तो भारत के लिए नकारात्मक से अधिक सकारात्मक बातें होंगी।
सरकार अर्थव्यवस्था में सुधार पर लगातार ध्यान दे रही है। ऐसा कोई सुधार, जो आपको लगता है कि प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए?
निवेश से लेकर कारोबारी सुगमता और अनुपालन कम करने समेत सरकार हर जगह सही काम कर रही है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि उद्योग को सस्ती बिजली मिले। दूसरा, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि बड़ी-से-बड़ी आबादी में स्किल सेट का विकास जारी रहे, क्योंकि 21वीं सदी की चुनौतियां 20वीं सदी से अलग होंगी। इसलिए, 150 नर्सिंग कॉलेज बनाना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। बजट में भी सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए सेंटर बनाने का जिक्र किया है। इसलिए, हम 21वीं सदी की चुनौतियों को देख रहे हैं और पहले से ही उसी हिसाब से स्किल तैयार कर रहे हैं। हमें अनावश्यक प्रक्रियाओं को हटाना जारी रखना होगा, जिसमें बहुत समय और प्रयास लगता है। विशेष रूप से छोटे व्यवसायों से।
आर्थिक विकास दर और महंगाई में आप किस तरह का तालमेल देखते हैं?
आर्थिक सर्वे में 2023-24 में हमने जीडीपी के 6.5 फीसदी की दर से आगे बढ़ने की बात कही है। पर, वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति की दुनिया अभी बहुत स्थिर नहीं है। दुनियाभर में उथल-पुथल है। कई चुनौतियों के बावजूद भरोसा है कि हम 6.5 फीसदी के वास्तविक विकास को हासिल कर लेंगे। नॉमिनल जीडीपी की वृद्धि दर करीब 11 फीसदी होगी। हालांकि, सरकार ने बजट में काफी सावधानीपूर्वक इसे 10.5 फीसदी बताया है। पिछले चार वर्षों में हमारा बजट विवेकपूर्ण, प्रोग्रेसिव और पारदर्शी रहा है। क्वालिटी निवेश बढ़ा है। बेकार के खर्चों पर लगाम लगी है। कुल मिलाकर मुझे लगता है कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक स्थिति को देखते हुए हमारी विकास की संभावनाएं काफी अच्छी हैं।
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