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पहले यह 26 नंबर विधानसरणी के नाम से विख्यात थी। यह वह स्थान है, जो करीब एक सदी का इतिहास अपने में समाए हुए है।
– फोटो : Amar Ujala
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देश और दुनिया के लोग उत्तर कोलकाता को भारतीय वेदांत दर्शन को दुनियाभर में फैलाने वाले रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य स्वामी विवेकानंद के जन्मस्थान के रूप में पहचानते हैं। इस स्थान की एक और पहचान है। वह है, स्वामी विवेकानंद के पैतृक वासगृह से चंद कदम की दूरी पर स्थित प्रज्ञा मंदिर।
दरअसल, पहले यह 26 नंबर विधानसरणी के नाम से विख्यात थी। यह वह स्थान है, जो करीब एक सदी का इतिहास अपने में समाए हुए है। आजादी से पहले और बाद में जब-जब देश को राजनैतिक हो या सामाजिक क्षेत्र में सेवा की जरूतर पड़ी, 26 नंबर विधानसरणी ने अग्रणी भूमिका निभाई। बाहर से देखने पर बहुत ही साधारण है यह भवन लेकिन आज भी उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं हुआ है। शायद यह कोलकाता का एक मात्र भवन है, जिसकी सीढ़ियां आज भी काठ (लकड़ियों) की हैं।
एक पार्टी की यात्रा की शुरुआत
यहां प्रवेश के लिए एक छोटा सा गेट है। घुमावदार सीढ़ियों से होते हुए जब आप ऊपर चढ़ते जाते हैं, तो दीवारों पर देश के महान शहीदों से आपका सामना होता है। जैसे-जैसे आप ऊपरी मंजिल की ओर बढ़ते जाते हैं, सकारात्मक ऊर्जा से आप भरते जाते हैं। दूसरी मंंजिल पर एक बृहद पुस्तकालय आपका स्वागत करती है। जहां हैं, तीन लकड़ी की टेबल और लकड़ी की कुछ कुर्सियां।
यह वह स्थान है, जहां 1940 में पूर्व भारत का प्रथम विरासती कार्यालय ‘माधव स्मृति’ की स्थापना हुई थी। तबसे लेकर यह मातृभूमि की सेवा में सतत लगी हुई। यह वह स्थान है, जहां द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी माधव सदाशिव गोलवरकर के मार्ग-दर्शन और प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की चालीस से अधिक प्रकल्पों को मूर्त रूप मिला। नोआखाली के दंगा पीढ़ितों को यहां आश्रय मिला था। यहीं बैठकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी देश के भविष्य की रणनीति बनाते थे।
यहीं पर खड़े होकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारत की सनातन विचारधारा को युगानूकुल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को ‘एकात्म मानववाद’ पर लगातार चार दिनों तक संबोधित किया था। यह वही जगह है, जहां पर श्रीगुरुजी की प्रेरणा से कन्या कुमारी में संघ के सरकार्यवाहक एकनाथ रानडे के मार्ग-दर्शन में विवेकानंद स्मृति शिला की बीज पड़े थे। इनके साथ-साथ यह वही स्थल है जहां श्रीगुरुजी की प्रेरणा से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की थी।
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