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नीदरलैंड में गीर्ट वाइल्डर्स का प्रधानमंत्री बनना तय (फाइल फोटो)
– फोटो : ANI
विस्तार
यूरोपीय देश नीदरलैंड में सरकार बदलने वाली है। देश के आम चुनाव में दक्षिणपंथी नेता गीर्ट वाइल्डर्स की जीत के बाद नीदरलैंड में राजनीतिक उथल-पुथल का माहौल है। हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि प्रचंड बहुमत के अभाव में गीर्ट को विपक्षी दलों को मनाने की चुनौती का सामना करना पड़ता है। सियासी अटकलों के बीच इनका प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ होना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि गीर्ट वाइल्डर्स ने मुस्लिम समुदाय को सीधे प्रभावित करने वाले प्रस्ताव सामने रखे हैं। उन्होंने कहा है कि सरकार बनने के बाद वे नीदरलैंड में कुरान पर प्रतिबंध लगाएंगे।
इसके अलावा गीर्ट वाइल्डर्स मस्जिदों को बंद करने और मुस्लिम-बहुल देशों से नीदरलैंड में आने वाले मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बताने जैसे विवादित बयान भी दे चुके हैं। गीर्ट वाइल्डर्स की अगुवाई में नीदरलैंड की सरकार बनने के बाद अगर उनकी सरकार ने मुस्लिम आबादी से जुड़े तमाम प्रस्तावों को कानूनी अमलीजामा पहनाया तो इससे असंतोष पनपने की आशंका है। इससे पहले भारत में पैगंबर मुहम्मद को लेकर हुई बयानबाजी में गीर्ट ने नुपूर शर्मा का समर्थन कर सुर्खियां बटोरीं थीं।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नीदरलैंड के चुनाव में गीर्ट वाइल्डर्स को अप्रत्याशित जीत मिली है। शुक्रवार को उन्होंने सरकार गठन के लिए गठबंधन बनाने और बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े जुटाने की आधिकारिक प्रक्रिया शुरू की। खबरों के अनुसार, बुधवार के चुनाव में वाइल्डर्स की पार्टी- पीवीवी फ्रीडम पार्टी को विजेता घोषित किया गया।
गीर्ट वाइल्डर्स कौन हैं?
नीदरलैंड में वाइल्डर्स की छवि दक्षिणपंथी नेता के रूप में है। लोकलुभावन वादे और विवादित बयान देने वाले वाइल्डर्स पार्टी फॉर फ्रीडम (पार्टिज वूर डी व्रिजहीद, पीवीवी) के संस्थापक नेता हैं। 6 सितंबर, 1963 को नीदरलैंड के वेनलो में जन्मे वाइल्डर्स ने राजनीतिक करियर की शुरुआत उदारवादी पार्टी पीपुल्स पार्टी फॉर फ्रीडम एंड डेमोक्रेसी (वीवीडी) के साथ की। 2006 में उन्होंने अलग पार्टी बनाने का फैसला लिया। उन्होंने आप्रवासन विरोधी नीतियों पर विशेष जोर दिया।
वाइल्डर्स ने विशेष रूप से गैर-पश्चिमी आप्रवासियों के खिलाफ मुखरता से बयान दिए। उन्होंने इस्लाम की आलोचना जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया। उन्होंने अक्सर डच संस्कृति और पश्चिमी मूल्यों के लिए इस्लाम के लिए खतरा बताया है। विवादित टिप्पणियों के कारण वाइल्डर्स को कानूनी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है। 2016 में नफरत फैलाने वाले भाषण के लिए सजा मिली थी, लेकिन अपील में उन्हें अदालत से राहत मिली थी।
मुसलमानों के खिलाफ वाइल्डर्स की बयानबाजी
वाइल्डर्स इस्लाम की आलोचना में कितने मुखर रहे हैं इसका अंदाजा उनके बयानों से होता है। अक्सर इस्लाम को चरमपंथ के साथ जोड़ने वाले वाइल्डर्स कई ऐसे बेतुके बयान दे चुके हैं, जो यूरोपीय संस्कृति के साथ-साथ उदारवाद को चुनौती देते हैं। इस्लाम को पश्चिमी मूल्यों के साथ असंगत बताने वाले वाइल्डर्स मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बताते हैं। ऐसे बयानों के कारण बड़ी आबादी को हाशिए पर धकेले जाने का खतरा है। वह नीदरलैंड से मुस्लिमों को निकाले जाने को लेकर “डी-इस्लामीकरण” की वकालत करते हैं।
वाइल्डर्स की बयानबाजी और नीतियों के कारण मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव को वैधता मिलने और ऐसे मामले बढ़ने की क्षमता है। उनके प्रधानमंत्री बनने पर नागरिकों के बीच व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी पनपने का खतरा है। मुसलमानों के प्रति शत्रुता भड़कने का भी खतरा है। खबरों के अनुसार, राजनीतिक विमर्श में इस्लाम और मुसलमानों का लगातार नकारात्मक चित्रण हो रहा है। इससे मुस्लिम समुदाय पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर होने का डर है। इससे अलगाव की भावना पैदा हो सकती है और अपने ही देश में अपनापन न होने की भावना पैदा हो सकती है।
वाइल्डर्स पर मुसलमानों के विचार
यूरोपीय देश के सत्ता परिवर्तन और वाइल्डर्स के पीएम बनने को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, नीदरलैंड में रहने वाले कुछ डच मुसलमानों ने अलग-थलग महसूस होने की शिकायत की है। इनका कहना है कि समाज के कुछ वर्गों से घृणा का सामना करना पड़ रहा है। विशेषकर सोशल मीडिया पर शत्रुता बढ़ रही है। हेट स्पीच का भी सामना करना पड़ रहा है। कुछ लोग उत्पीड़न से बचने के लिए नीदरलैंड छोड़ने जैसे बड़े विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
मुस्लिम संगठन सीएमओ के मुहसिन कोक्टास के अनुसार वाइल्डर्स की जीत वाले चुनावी नतीजे डच मुसलमानों के लिए चौंकाने वाले हैं। उन्होंने कहा, हमें उम्मीद नहीं थी कि कानून के शासन के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ बोलने वाले नेता की पार्टी सरकार बना लेगी। 45 वर्षीय सामुदायिक कार्यकर्ता अब्देसामद ताहेरी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, वाइल्डर्स की जीत एक झटका था जिसका उन्हें सामना करना पड़ा।
डच मोरक्को संगठन का नेतृत्व करने वाले हबीब अल कद्दौरी ने गार्जियन को बताया, वाइल्डर्स मुसलमानों के बारे में अपने विचारों के लिए जाने जाते हैं… हमें डर है कि वह हमें दूसरे दर्जे का नागरिक बना देंगे। इनके अलावा अन्य डच मुसलमानों ने भी सरकारी फरमानों को न मानने, उदारवादी रूख अपनाने और एकजुटता दिखाने की बात कही है। उन्होंने वाइल्डर्स के एजेंडे का विरोध करने और अपनी पहचान और मूल्यों की रक्षा करने का संकल्प लिया है।
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