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कल्पना पाराशर का आलेख
– फोटो : Amar Ujala
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट के सर्वसम्मत निर्णय के बाद से मंदिर निर्माण तक यात्रा में भारत वासियों ने जाति, पंथ की सीमाएं तोड़ते हुए आस्थागत, भावनात्मक और आर्थिक रूप से जिस तरह से सहयोग किया है, उससे कई भ्रामक नैरेटिव साफ तौर पर ध्वस्त हुए हैं। ऐसा ही एक नैरेटिव ये बनाने की कोशिश की गई कि भारतीय जनजातीय समुदायों के आराध्य राम नहीं हैं। लेकिन देश के जनजातीय समाज ने मंदिर के लिए निधि समर्पण अभियान में जिस तरह बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, उसने स्पष्ट कर दिया कि समाज विरोधी लोग और संगठन किस तरह फेक नैरेटिव बनाने के षड्यंत्र रचते हैं।
वास्तविकता तो यही है कि 14 साल तक वन गमन के दौरान राम ने वनवासियों के अपार समर्थन से ही रावण पर विजय पाई। रावण से युद्ध के लिए राम अयोध्या और उसके मित्र राजाओं की सेनाओं का प्रयोग कर सकते थे, किंतु उन्होंने इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी। जनजातीय समुदायों की स्वप्रेरित सेना ही उनके लिए लड़ी। अब जबकि राम लला का राष्ट्र मंदिर आस्था का वैश्विक केंद्र बनने जा रहा है, तब उपरोक्त फेक नैरेटिव को उधेड़ने के लिए आवश्यक है कि भारतवासी जानें कि वर्ष 2021 में मंदिर के लिए चलाए गए निधि समर्पण अभियान में जनजातीय समुदाय का कितना योगदान रहा।
निधि समर्पण अभियान अपनी तरह की पहली सामाजिक वैश्विक घटना है, इसमें कोई संदेह नहीं है। कोई शोर-शराबा नहीं, प्रचार नहीं और नौ लाख से ज्यादा कार्यकर्ताओं की एक लाख, 75 हजार टोलियां अभियान में जुटीं। हर जाति, पंथ, समुदाय ने हजारों करोड़ रुपये से ज्यादा की निधि राम लला मंदिर के लिए समर्पित की। यहां तक कि मुस्लिम और दूसरे धर्मों के परिवार भी पीछे नहीं रहे।
राम ने शबरी का उद्धार किया, कोल, भील, निषाद राम के अनन्य सहयोगी रहे। वाल्मीकि ने संस्कृत में रामायण लिखी। राम लला के मंदिर के लिए निधि समर्पण अभियान की शुरुआत दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर से ही की गई। भारत के जंगलों, पहाड़ी और दूसरे इलाकों में रहने वाले जनजातीय समुदाय ने निधि समर्पण में बढ़-चढ़ कर सहयोग किया। सिक्किम के एक सुदूर गांव की 95 वर्ष की महिला ने गंगटोक आकर अभियान की टोली को 51 हजार रुपये दिए। पश्चिमी सिक्किम के एक बौद्ध लामा तो निधि समर्पण अभियान के प्रमुख बने। उनकी टोली ने पश्चिम सिक्किम के 48 मंडलों में से 40 में संपर्क कर निधि जुटाई।
झारखंड के दुमका जिले के किरौनी और सीटवारा गांवों को लेकर भ्रम की स्थितियां बनाई गई थीं। आम धारणा थी कि दोनों गांव ईसाई पूजा पद्धति अपना चुके हैं, लेकिन निधि समर्पण अभियान की टोली जब वहां पहुंची, तो पता चला कि केवल एक ही परिवार ने ईसाई धर्म अपनाया था, बाकी सभी जनजातीय परिवार सनातन संस्कृति में ही भरोसा रखते हैं। गांव वालों ने उदारता से समर्पण किया। झारखंड में लातेहार जिले के सुदूर जंगलों में बसे होसीर गांव में चेरी जनजाति के लोग रहते हैं। वे लोग स्वयं को च्यवन ऋषि के वंशज मानते हैं। उन्होंने दिल खोल कर निधि समर्पण किया। राज्य के परहिया, खेरवार, बिरहोर, गुड़पानी और बिरिजिया जनजातीय समूहों ने भी विपन्नता की स्थितियां रहने के बावजूद मंदिर निर्माण के लिए समर्पण किया। राम के साथ ही वे लोग पांडवों से भी अपना जुड़ाव मानते हैं।
छत्तीसगढ़ के बिलौदा नगर में घासफूंस की झोपड़ियों में रह रहे देवरी जनजाति के लोगों ने निधि समर्पण टोली का भव्य स्वागत किया। यथासंभव निधि समर्पण किया। राज्य के सुकमा जिला मुख्यालय से 53 किलोमीटर दूर घने जंगलों में गांव पंचायत कोडरे के तहत आने वाले जनजातीय गांव पेरमा पारा में रहने वाले 95 साल के हिरमा राम ने अपनी चार महीने की पेंशन मंदिर के लिए समर्पित की। माना जाता है कि उस इलाके में ही रावण ने पुष्पक विमान से आ कर सीता माता का अपहरण किया था।
ओडिशा के राउरकेला शहर के सेक्टर 14 में कई ईसाइयों ने भी निधि समर्पण किया। कूआंरमूंडा ब्लॉक में कुमझारिया ग्राम पंचायत के जनजातीय रायछापला गांव में 40 ईसाई परिवारों ने राम लला के मंदिर के लिए समर्पण किया। ओडिशा के ही मलकानगिरि जिले के एक छोटे से जनजातीय गांव में एक व्यक्ति ने पिता की मृत्यु के बाद मिली बीमे की एक लाख, एक हजार रुपये की राशि राम लला के राष्ट्र मंदिर के लिए समर्पित की।
मुंबई के उपनगर ठाणे में जनजातीय लोगों की बस्ती का नाम वनवासीपाणा है। वहां रह रहे एक व्यक्ति ने बताया कि उनका एक भाई कारसेवा के दौरान जान गंवा चुका है। उन्होंने दो हजार रुपये की निधि समर्पित की। इसी तरह राजस्थान के टोंक जिले में कालबेलिया जनजाति के जगदीश ने राम लला मंदिर निर्माण के लिए 21 हजार रुपये की निधि समर्पित की। जब समाज के प्रमुख लोगों के सामने उन्होंने ये घोषणा की, तो सभी हैरान रह गए, क्योंकि झोपड़ी में रह रहे जगदीश के पास इतने रुपये होने की उन्हें उम्मीद नहीं थी। लेकिन जगदीश ने बताया कि वे बहुत दिनों से रुपये जमा कर रहे थे।
दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में घुमंतू जनजाति के छह लोग अभियान से कार्यकर्ता के रूप में जुड़े। उन्होंने सात दिन तक समर्पण निधि जुटाई। अभियान कार्यकर्ता आंध्र के श्रीकाकुलम जिले की जनजातीय बस्ती में राम रथ लेकर गए, तो वहां रहने वाले समनतोला नाम के जनजातीय लोगों ने पूरी श्रद्धा और आस्था से निधि समर्पण किया।
इस तरह स्पष्ट हो जाता है कि ये नैरेटिव गलत है कि देश की जनजातियां राम को आराध्य नहीं मानतीं। तुलसीदास की रामचरित मानस में जिस तरह जनजातियों के कुटुंबों से राम, सीता और लक्ष्मण की निकटता का जो जीवंत वर्णन मिलता है, आज भी वैसा ही है। पूर्व से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक कन्वर्जन का कुचक्र रचने वालों के दुष्प्रचार का कोई प्रभाव अधिकतर जनजातीय समाज पर नहीं पड़ा है। पीढ़ी दर पीढ़ी वे भगवान राम को अपने हृदय में रचा-बसा पाते हैं।
– कल्पना पाराशर
(लेखिका, समाज सेवी और वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
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