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खबरों के खिलाड़ी: प्राण प्रतिष्ठा से पहले क्यों हो रही सियासत, 2024 के चुनाव से पहले कौन कैसे साध रहा समीकरण?

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खबरों के खिलाड़ी: प्राण प्रतिष्ठा से पहले क्यों हो रही सियासत, 2024 के चुनाव से पहले कौन कैसे साध रहा समीकरण?

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खबरों के खिलाड़ी।
– फोटो : अमर उजाला

विस्तार


अयोध्या में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा सोमवार को होनी है। इससे पहले देश में उत्सव जैसा माहौल है। प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियों के बीच सियासत भी जारी है। कई दल 22 जनवरी को अयोध्या जाने से इनकार कर चुके हैं। इन दलों का कहना है कि यह भाजपा का राजनीतिक आयोजन है। इसे 2024 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। इसके लिए कई अहम बातों को नजरअंदाज किया गया है।

विरोध करने वाले ज्यादातर दल 22 जनवरी के बाद अयोध्या जाने की बात कर रहे हैं। प्राण प्रतिष्ठा को लेकर हो रही राजनीति पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल सिंह, प्रेम कुमार, समीर चौगांवकर और राकेश शुक्ला मौजूद रहे। 

राम कृपाल सिंह: भाजपा शुरू से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति करती रही है। यह जनसंघ के जमाने से रहा है। यह उनके डीएनए का हिस्सा रहा है। मुझे ऐसा लगता है कि विपक्ष की कमजोरी का एक बेसिक कारण यह है कि आप मूल बातों को नजरअंदाज करते हैं। यह कहना कि राम के नाम पर भाजपा वोट मांग रही है। 2019 में इसी तरह की बातें हो रही थीं। 2024 के चुनाव नतीजों के बाद इस तरह की बात हो सकती है। जमीनी स्तर पर राजनीतिक बदलाव हुआ। 

जो सामाजिक आर्थिक बदलाव हुए हैं उसकी वजह से बहुत से वोटर भाजपा के साथ जुड़े हैं। ये वोटर सिर्फ मंदिर की वजह से नहीं जुड़े हैं। हिन्दुस्तान का 50 फीसदी वोटर पिछड़ी जाति से आता है। वह भाजपा के साथ क्यों है। यह भी देखना होगा। यह राम प्लस काम नहीं है। यह काम प्लस राम है। राम तो 1993 में भी मुद्दा थे। इसके बाद भी भाजपा आईसीयू में चली गई थी। इसीलिए यह देखना होगा कि यह सिर्फ राम के नाम पर जुड़ा वोटर नहीं है। 

भाजपा सभी विरोधी पार्टियों को अपनी पिच पर बुला रही है। राहुल गांधी बजरंगबली का मुखौटा पहने नजर आ रहे हैं। अरविंद केजरीवाल सुंदर कांड करा रहे हैं। मैं बार-बार कहता हूं कि इस देश में यह पहली बार हुआ है कि अल्ट्रा लेफ्ट और कांग्रेस को एक राइटविंग के आदमी ने ध्वस्त कर दिया है। 

प्रेम कुमार: एक समय था जब पर्याप्त अनाज का उत्पादन नहीं होता था। तब 1965 के युद्ध के दौरान लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था एक समय भोजन नहीं करिए। लेकिन, इसके बाद हरित क्रांति हुई। देश मे पर्याप्त अनाज हुआ। क्या इन उपलब्धियों को आप नहीं मानेंगे? जहां तक धार्मिकता सवाल है तो कई लोग इससे संलग्न हैं। कई लोग तटस्थ भी हैं। कई लोग इससे दूर भी हैं। इसके बाद भी अगर जो तटस्थ हैं या दूर हैं उन्हें अधर्मी नहीं कहा जा सकता है। यह भी राजनीति का एक पहलू है। यह भी नहीं होना चाहिए। यह बात सही है कि 1990 के दशक में जब मंडल आया तब भी राजनीति बदली थी। उसके अनुरूप भाजपा ने अपने आप को अनुकूलित किया। इसी वजह से भाजपा का नेतृत्व पिछड़े वर्ग के पास है। इसके बाद भी यह नहीं कह सकते कि पूरा का पूरा पिछड़ा वोट किसी एक पार्टी के साथ है।

समीर चौगांवकर: भारत के अंदर धर्म का इस्तेमाल राजनीति के लिए होता रहा है। यह नेहरू के जमाने से है। हालांकि, आजादी के बाद से ही कांग्रेस के अंदर वैचारिक विरोधाभास रहा है। सोनिया गांधी ने जो राम लला की प्राण प्रतिष्ठा का न्योता ठुकराया है वह इसी वजह से है। पिछले चुनाव में कांग्रेस को 52 सीटें मिली थीं। इनमें से करीब आधी ऐसी थीं जो मुस्लिम बहुल इलाकों से आईं थीं। शायद उस वोटर को साधाने के लिए ही कांग्रेस ने ऐसा किया गया। कांग्रेस को मुख्य एजेंडा है कि मुस्लिम वोट बैंक का बड़ा हिस्सा उसे मिले। मुझे लगता है कि कांग्रेस ने जिस तरह से न्योता ठुकराया है वह तरीका गलत रहा। चुनावी तर्क को कांग्रेस संभालने में विफल रही है। मुझे लगता है कि कांग्रेस के पास अपना स्टैंड स्पष्ट करने का एक लंबा समय है। इसके बाद भी कांग्रेस उसे स्पष्ट करने में चूक गई। 

राकेश शुक्ला: कांग्रेस चुनावी फायदे और नुकसान को देखते हुए शुरू से चलती रही है। सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना ठीक नहीं है। कांग्रेस की ओर से जब राम मंदिर का पट खुलवाया गया तब उसी कांग्रेस का प्राण प्रतिष्ठा का विरोध करना कितना सही है? आज कांग्रेस अपने वोट के लिए संघर्ष कर रही है। लोकसभा में उसका लगातार क्षरण हो रहा है क्या आप उसे 2024 में रोक पाएंगे? आपने एक बड़ा अम्ब्रेला बनाने की कोशिश की लेकिन उसमें भी चादर नहीं लग पाई है। आजादी के बाद कहा गया कि समाजनीति ऊपर होगी और राजनीति नीचे होगी। लेकिन, इंदिरा जी का समय आने के बाद राजनीति ऊपर हो गई और समाजनीति नीति नीचे चली गई। आज भी अगर राजनीति ऊपर है तो उसे कांग्रेस गलत नहीं कह सकती है।






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