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PM Modi
– फोटो : Amar Ujala
विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्राण-प्रतिष्ठा के बहाने राम के सरोकारों से भविष्य का एजेंडा भी साध गए। उन्होंने राम से सनातन संस्कृति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सोशल इंजीनियरिंग से जुड़े सरोकारों के उल्लेख से अतीत की विरासत की याद दिलाई। बिना नाम लिए सनातन संस्कृति को चुनौती देने की साजिशों का उल्लेख कर संकेतों से ऐसे लोगों को सबक सिखाने को कहा। राम को समस्या नहीं, समाधान बताकर लोगों से एक तरह से राम नाम का विरोध करने वालों को करारा जवाब दिया। अपने लोगों को वर्तमान की उपलब्धि और भविष्य की चुनौतियां बताकर आगे की तैयारियां समझाईं। इसके लिए जुटने का आह्वान भी किया। देश ही नहीं विदेश के भी कुछ देशों को यह बताया कि उनकी सरकार किसी भी दबाव में राम के सरोकारों और सांस्कृतिक एजेंडे से पीछे हटने वाली नहीं है, लोग उन पर कितना भी आरोप लगा लें।
राम को समन्वय, संतुलन और देश के सनातन संस्कृति के सरोकारों के प्रतीक बताते हुए उन्होंने जब यह कहा कि राम का चरित्र न तो संकीर्णता सिखाता है और न संघर्ष, तब यह साफ हो गया कि वह राम के सरोकारों और सनातन संस्कृति के कामों पर आगे बढ़ते रहेंगे। मोदी ने अयोध्या से आज जो किया है, उसका जवाब आसानी से ढूंढ़ पाना विपक्ष के लिए बहुत आसान नहीं दिख रहा है। उन्होंने लोगों के सामने देश के विकास का 1,000 साल का एजेंडा रखते हुए भाजपा की संभावनाओं को विस्तार दिया। इतनी बड़ी लकीर को पार करना विपक्ष के लिए आसान नहीं है।
मोदी ने बिना नाम लिए विपक्ष की नीतियों पर करीने से प्रहार किया। उनके साथ खड़े लोगों को राम से जुड़ी उनकी विरासत समझाते हुए साथ आने का आह्वान भी किया। समर्थकों को यह भरोसा देने से भी नहीं चूके कि विपक्ष की कोशिशों के बावजूद सनातन संस्कृति के सरोकारों को सम्मान देने का सिलसिला रुकने वाला नहीं है। पर, इसके लिए उनसे संयम की अपेक्षा भी की। राम ऊर्जा है आग नहीं कहते हुए उन्होंने अपने लोगों को प्राण-प्रतिष्ठा को विजय के रूप में न देखने की सलाह दी। एक तरह से सचेत करने की कोशिश की है कि उत्साह में कुछ ऐसा न करें कि विरोधियों को मौका मिल जाए। एक तरह से समझाया कि अभी बहुत कुछ करना है। जिसके लिए संयम और शांति जरूरी है ।
विपक्ष पर प्रहार
पीएम मोदी ने यह कहते हुए कि कुछ लोग कहते थे कि राममंदिर बना तो आग लग जाएगी, ऐसे लोग राम की पवित्रता के भाव को समझ नहीं पाएर, यह नहीं समझ पाए कि राम भारत की आत्मा हैं। एक तरह से यह संदेश दिया कि राम को शक्ति हीन व काल्पनिक बताने वाले देश का भला नहीं कर सकते। उन्होंने राम को सनातन संस्कृति की शक्ति का प्रतीक बताते हुए विरोधियों को चुनौती दी कि उन्हें राम के अस्तित्व को स्वीकार करना होगा। एक तरह से यह संदेश देने की कोशिश की कि राम के नाम से वोट गणित बिगड़ जाने वालों की नीतियों के कारण ही मंदिर बनने में देरी हुई। सबकी जिम्मेदारी है कि वह राम के अस्तित्व को नकारने वालों को राम की ताकत का एहसास कराएं। संविधान की पहली प्रति में श्रीराम के चित्र होने के बावजूद प्रभु श्रीराम के अस्तित्व की लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की मजबूरी का जिक्र करते हुए मोदी ने अतीत की सरकारों की तुष्टीकरण नीति पर भी हमला किया। उन्हें कठघरे में खड़ा किया। बाकी काम तो मुख्यमंत्री योगी आदित्याथ उनसे पहले ही अयोध्या की गलियों में अब गोलियां नहीं वाद्य यंत्रों की छाप गूंज रही, आने वालों पर लाठियां नहीं, फूलों से स्वागत हो रहा…कहकर कर चुके थे। राम को भारत की आत्मा, दृष्टि, दर्शन और राष्ट्र की चेतना बताकर मोदी ने उनको भी जवाब दे दिया, जो राम को काल्पनिक व राम मंदिर को सांप्रदायिकता से जोड़ते रहे हैं।
इशारों को समझो
मोदी ने स्पष्ट रूप से भले कोई राजनीतिक बात नहीं की, लेकिन भविष्य के एजेंडे पर संदेश, संकल्प जताने व आगाह करने के लिए हर संभव प्रतीकों को आजमाया। राम को भारत का चिंतन, दिग्दर्शन, आत्मा, प्रतिष्ठा, विभु और विशद जैसे सांकेतिक शब्दों से रामराज्य का संदेश बखूबी देने की कोशिश की। वह लोगों को यह भरोसा देकर ही लौटे कि वे उनका साथ देते रहे। समर्थन और समर्थक बढ़ाते रहे। बाकी उन पर छोड़ दें।
बिना नाम हिंदुत्व को धार
प्रधानमंत्री ने भाषण में एक बार भी हिंदुत्व का नाम नहीं लिया, लेकिन इसे भी धार देने में कोई चूक नहीं की। उन्होंने रामलला के अब टेंट में न रहने और भव्य भवन में आने का उल्लेख कर रामलला के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर निर्माण के संकल्प को पूरा करने की लोगों को याद दिलाई। सदियों के धैर्य की धरोहर बताकर तथा इस दिन के लिए जीवन बिता देने और गवां देने वाले लोगों तथा कारसेवकों की आत्मा को प्रणाम कर भी उन्होंने हिंदुत्व की चेतना को बखूबी साधा। अयोध्या आने से पहले राम के वनवास से जुड़े स्थलों की पूजा-अर्चना करने का उल्लेख कर उत्तर से दक्षिण को ही नहीं जोड़ा बल्कि राम के सरोकारों से उन्हें भी हिंदुत्व के साधने की कोशिश की। रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा से पूर्व रामसेतु की पूजा-अर्चना का उल्लेख कर उत्तर-दक्षिण के सनातनी सरोकारों में सामंजस्य के समीकरण साधे। इस जुड़ाव को सोशल इंजीनियरिंग से और मजबूती देने के लिए उन्होंने हनुमान, जटायु, निषाद जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल किया। क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों में संतुलने के लिए उन्होंने सबके अलग-अलग स्वरूप के राम होने के बावजूद उनका चरित्र और संस्कृति एक होने का उल्लेख कर एक तरह से सबको सनातनी संस्कृति से जोड़कर हिंदुत्व से साधने की कोशिश की।
सबकी मंगल कामना…नाम नहीं पर काम वही
संकेतों में ही सही, लेकिन पीएम ने यह भी संदेश दे दिया कि उनकी सरकार विकास का एजेंडा राम की संकल्पना पर ही चला रही है। जिसका सूत्र सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विकास में भौतिक विकास का रास्ता बनाना है । उन्होंने इसके लिए अलग-अलग प्रतीकों का प्रयोग भी किया। यह समझाने का प्रयास भी किया कि अयोध्या में सिर्फ रामलला का मंदिर भर नहीं बना है, बल्कि सांस्कृतिक सरोकारों पर हुए काम से अयोध्या सहित आसपास के इलाकों का विकास भी हुआ है। लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी खुले हैं। उन्होंने यह संकेत भी दिया कि वह रामराज्य शब्द का उल्लेख इसलिए नहीं कर रहे हैं, क्योंकि राम भगवान हैं। उनकी बराबरी करने की उनकी सामर्थ्य नहीं है । पर, एक भक्त के रूप में उनका प्रयास उसी आदर्श पर राज्य का विकास करना है। जिसका सूत्र सबकी मंगल कामना है। सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास-सबका प्रयास उसी का एक रूप है।
क्षेत्रीय संतुलन भी
पीएम मोदी राम के सरोकारों से विदेशों तक को जोड़ते नजर आए। प्राण-प्रतिष्ठा को वैश्विक पटल से जोड़कर अयोध्या के उदाहरण से उन्होंने संकेतों से विरासत आधारित विकास की विशेषता समझाई। देश से लेकर दुनिया तक अलग-अलग भाषाओं में कई रामायण होने के बावजूद राम के चरित्र के निरुपण में एकरूपता का जिक्र कर उन्होंने राम के सहारे क्षेत्र, भाषा, जाति के बीच संतुलन साधने की कोशिश की। बोला भले नहीं, लेकिन पूरे भाषण में मोदी सनातन संस्कृति के सरोकारों को राम के सहारे ज्यादा विस्तार देते दिखे। निश्चित रूप से उनकी कोशिश भविष्य की तैयारियों की तरफ इशारा करती दिखी। जनाधार को उत्तर से दक्षिण तक विस्तार देने की फिक्र दिखी। उन्हें इसमें कितनी सफलता मिलेगी या विपक्ष इससे कैसे निपटेगा, यह सब भविष्य बताएगी।
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