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उत्तराखंड विधानसभा में आया समान नागरिक संहिता विधेयक बीते हफ्ते चर्चा में रहा। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या आने वाले वक्त में इस तरह का कानून पूरे देश में लागू हो सकता है? क्या उत्तराखंड के रास्ते भाजपा इसे पूरे देश में लागू करने की तैयारी कर रही है? या अब भाजपा शासित राज्यों में एक-एक करके यह कानून लागू होगा? इन सभी सवालों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। इस चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार, विनोद अग्निहोत्री और रामकृपाल सिंह मौजूद रहे।
समीर चौगांवकर: समान नागरिक संहिता हमेशा से भाजपा के एजेंडे में रही है। भाजपा हमेशा से कहती रही है कि हम सत्ता में आएंगे तो इसे लागू करेंगे। भाजपा इसे पूरे देश में लागू करने की भूमिका तैयार कर रही है। आने वाले समय में या 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राजस्थान समेत भाजपा शासित राज्यों की सरकारें इसे लागू कर सकती हैं। प्रधानमंत्री मोदी कहते रहे हैं कि 2024 में बड़े फैसले लिए जाने हैं। मुझे लगता है कि यह इसकी शुरुआत है।
अवधेश कुमार: मोदी सरकार बनने के बाद विधि आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग ने समान नागरिक संहिता को लेकर लोगों से सुझाव मांगे थे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ समय पहले कहा भी था कि हमारे पास काफी सुझाव आ चुके हैं। विधि आयोग उस पर काम कर रहा होगा। सरकार ने नए सुझाव के लिए इसे फिर से जारी कर दिया था। ऐसे में इसका सवाल ही नहीं उठता है कि केंद्र सरकार समान नागरिक संहिता नहीं लाने वाली है। उत्तराखंड में आए विधेयक से यह जरूर हुआ है कि इसका एक आधार तैयार हो गया है। इसे लेकर कई सवाल उठाए जाते थे। उत्तराखंड में विधेयक आने के बाद इन सवालों का एक जवाब तैयार हुआ है। अब समान नागरिक संहिता विधेयक के आने के बाद इसके विरोधियों का दुष्प्रचार पूरी तरह से धराशायी हो गया है। नागरिक कानून की दृष्टि से यह एक बड़ा सुधार है। किसी की शादी का, गोद लेने का, तलाक लेने का कानून एक समान हो गया है। अगर कोई गैर सामाजिक काम हो रहा है तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।
भारत के लिए राजनीतिक आजादी 1947 में आई, आर्थिक आजादी 1991 के बाद आई, रक्षा के क्षेत्र में आजादी पोकरण के बाद आई तो सामाजिक आजादी की शुरुआत उत्तराखंड में आए समान नागरिक संहिता विधेयक के लागू होने के बाद से होगी। यह कानून बहुत आवश्यक था, इसमें विलंब हुआ है।
विनोद अग्निहोत्री: समान नागरिक संहिता जनसंघ के एजेंडे में शुरू से थी। जब हिन्दू कोड बिल लाया गया था, तब तत्कालीन दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों ने इसका बहुत विरोध किया था। किसी भी देश में प्रगतिशील कानून बने तो इससे कोई गुरेज नहीं रहा है। जनसंघ के जमाने से समान नागरिक संहिता उनका एजेंडा था, लेकिन इसमें मुस्लिम विरोध का पुट भी था। दूसरी विचारधारा वाले उनका विरोध यह कहकर करते थे कि यह एजेंडा मुस्लिम विरोधी है। यूनिफॉर्म सिविल कोड के मुद्दे पर भाजपा को कभी बहुमत नहीं मिला, लेकिन जब उसे बहुमत मिला तो वह उसे लागू करने की कोशिश कर रही है। उत्तराखंड एक छोटा राज्य है। भारत की विविधताओं के मुकाबले वहां उतनी विविधताएं नहीं हैं। वहां आसानी से इसे लागू किया जा सकता है। कुल मिलाकर, वहां इसे एक टेस्ट केस के तौर पर लागू किया जा रहा है। आदिवासियों को अगर आप छोड़ देंगे, जैसा उत्तराखंड में छोड़ दिया है तो यह यूनीफॉर्म कहां से रहा? इसे लैंगिक समानता के आधार पर देखते हैं तो यह एक अच्छा कदम है।
रामकृपाल सिंह: इस धरती पर मनुष्य का जो विकास हुआ है, उसमें मानवाधिकार की बात अचानक से नहीं आ गई है। जैसे-जैसे समाज का विकास होता है, वैसे-वैसे कानून और जीने का तरीका बदलता रहता है। समाज में जिस तरह से आर्थिक और सामाजिक बदलाव होते हैं, उस तरह से विकास का काम होता है। समान नागरिक संहिता को एक राज्य शुरू कर रहा है तो यह एक अच्छी शुरुआत हो रही है। यह एक स्वागत योग्य कदम है।अनुच्छेद-14 कहता है कि मनुष्य की बराबरी को अगर कोई कानून गैर-बराबरी में बदल रहा है तो उसे जाना ही होगा।
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