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पहले आम चुनाव में वोट डालने पर लगाई गई स्याही ही वोट देने की पहचान थी जो आज तक जारी है।
– फोटो : अमर उजाला
विस्तार
देश के पहले आम चुनाव यानी 1951 से ही मतदाता के उल्टे हाथ की तर्जनी अंगुली पर इंक से अमिट निशान लगाने की शुरुआत हो गई थी। हालांकि, कुछ देशों में अंगुली पर निशान लगाने के बजाय अंगुली का कुछ हिस्सा स्याही में डुबो दिया जाता है।
जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के अनुसार मतदाता को मतपत्र देने से पहले उसके बाएं हाथ की तर्जनी अंगुली पर अमिट स्याही का निशान बनाया जाता है। यह निशान इस बात का सूचक होता है कि मतदाता ने अपने मताधिकार का उपयोग कर लिया है। चूंकि, 1951 में कोई मतदाता कार्ड या पहचान पत्र नहीं थे, इसलिए अंगुली में वोट डालने पर लगाई गई स्याही ही वोट देने की पहचान थी जो आज तक जारी है।
स्याही मिटने की मिली शिकायतें
चुनाव आयोग के निर्देशन पर भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद् ने इस विशेष स्याही का निर्माण करवाया। इस स्याही को एक कांच की छोटी सी मार्कर से लगाया जाना था। यह निशान एक सप्ताह या इससे अधिक समय तक दिखाई देता था, फिर धीरे धीरे मिट जाता था। अमिट इंक के निशान को लेकर आयोग के पास कुछ शिकायतें प्राप्त हुई थीं। जैसे कि यह स्याही रबर से मिट जाती है, कुछ केमिकल या अन्य सामग्री से ये निशान मिट जाता है। आयोग द्वारा इन शिकायतों की जांच करवाई और पाया की यह संभव नहीं है, अमिट इंक की प्रामणिकता सही है।
अमिट स्याही नहीं मिटती
चुनाव आयोग की 1951 के चुनावों को लेकर 1955 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया कि अमिट स्याही उपयुक्त है, वह जल्दी नहीं मिटती है। प्रथम चुनाव के बाद कुछ स्थानीय निकायों के चुनाव में भी अमिट स्याही का प्रयोग काफी उपयोगी रहा है। प्रथम चुनाव में अंगुली पर इंक के प्रयोग का सामान्य जनमानस को समझाने में परेशानियां आई थीं, उन्हें इस बारे में और इसकी महत्ता के बारे में बताना होता था।
3.89 लाख शीशियां लगी थीं
देश में 1951-52 के प्रथम चुनाव में अमिट स्याही की 3 लाख 89 हजार 816 शीशियों का उपयोग किया गया था। इस अमिट इंक की शीशियों का मूल्य 2 लाख 27 हजार 460 रुपया था।
लाख या चपड़ी से सील की जाती थी मतपेटियां
पहले चुनाव के वक्त ही निर्वाचन आयोग ने मतपेटियों के मानक तय कर दिए थे। मतदान करने से पूर्व उपस्थित पोलिंग एजेंट जो अलग-अलग दल के रहते हैं उनके सामने मतपेटी जो पूर्णतः खाली दिखा कर उसे बंद किया जाता था। उसे बंद कर सील कर दिया जाता था और उस बूथ पर चुनाव अधिकारी के हस्ताक्षर होते थे। प्रथम चुनाव में इस्तेमाल सभी मतपेटियों को सील लगा कर बंद किया गया था।
नासिक सिक्यूरिटी प्रेस की सील मंजूर की थी
इसके लिए चुनाव आयोग ने नासिक सिक्यूरिटी प्रेस से निर्मित सील को पास किया था जिस पर अंग्रेजी में भारतीय चुनाव आयोग दर्ज था। वह लाख या चपड़ी से लगा दी जाती थी। गुलाबी रंग की सील से बंद मतपेटी पर चुनाव आयोग प्रिंट हो जाता था। इस तरह 25 लाख 84 हजार मतपेटियों के लिए बनवाई गई सीलों की लगत 11 हजार 243 रुपए रही थी। यदि ताला लगाया जाता जो उसकी चाबी और उसकी लागत को भी आयोग को देखना था इसलिए पेपर सील का प्रयोग किया था। इस तरह इस सील ने आयोग के 1951-52 में करीब एक करोड़ रुपयों की बचत हुई थी।
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