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Cannes Fake Awards: फाल्के के बाद मुंबई में कान फिल्म फेस्टिवल के नाम पर फर्जीवाड़ा, अजित राय ने बताई असलियत

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Cannes Fake Awards: फाल्के के बाद मुंबई में कान फिल्म फेस्टिवल के नाम पर फर्जीवाड़ा, अजित राय ने बताई असलियत

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एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर) समुदाय पर बनी फिल्में भले भारत में व्यावसायिक रूप से सफल न होती हों, लेकिन ऐसी फिल्मों का विदेश में होने वाले अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में खूब सम्मान होता रहा है। ऐसे में अगर कोई शख्स ये दावा करे कि उसकी ऐसी ही किसी फिल्म को कान फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार मिला है तो नए नए लोगों को इस पर यकीन भी हो जाता है। ऐसा ही एक मामला मंगलवार को तब सामने आया जब मुंबई की एक पीआर एजेंसी ने एक फिल्म को इस समुदाय पर बनी फिल्म बताते हुए इसके कान फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ एलजीबीटीक्यू फिल्म का पुरस्कार विजेता बताया।

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एलजीबीटीक्यू समुदाय पर बनी फिल्म ‘कैद: नो वे आउट’ के बारे में मीडिया में यह प्रचारित किया जा रहा है कि इस फिल्म को साल 2023 के प्रतिष्ठित कान फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ एलजीबीटीक्यू फिल्म पुरस्कार मिला है। इस पुरस्कार के परिप्रेक्ष्य में फिल्म की निर्देशक सोनिया कोहली के इंटरव्यू का आमंत्रण भी मीडिया को भेजा गया। कान फिल्म फेस्टिवल में ऐसा कोई पुरस्कार चूंकि मिलता नहीं है तो इस आमंत्रण को देखते ही माथा ठनकना लाजिमी था। फिर भी, पुष्टि करने के लिए जब कान फिल्म फेस्टिवल की आधिकारिक वेबसाइट खंगाली गई लेकिन वहां ऐसी कोई फिल्म हो तो न मिले।


इस बारे में लगातार कान फिल्म फेस्टिवल जाते रहे वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजित राय कहते हैं, ‘कान फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ एलजीबीटीक्यू फिल्म पुरस्कार की कोई श्रेणी नहीं है। जिन फिल्मों को वहां पुरस्कार मिलता है, उसकी जानकारी उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर होती है। कुछ लोग कान फेस्टिवल के दौरान बाहर जो पंडाल लगे होते हैं, वहां फोटो खींचकर पोस्ट कर देते हैं कि वह कान फिल्म फेस्टिवल हो आए हैं।’  


मुंबई में जिस पीआर टीम ने इस फिल्म को साल 2023 के प्रतिष्ठित कान फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ एलजीबीटीक्यू फिल्म पुरस्कार विजेता बताकर फिल्म की निर्देशक सोनिया कोहली के इंटरव्यू के लिए लोगों को आमंत्रित किया। उसके संचालकों को ने सवाल किए जाने पर पहले तो चुप्पी साध ली फिर और कुरेदने पर माना कि इस फिल्म को कान फिल्म फेस्टिवल में नहीं बल्कि कान वर्ल्ड फिल्म फेस्टिवल में ये पुरस्कार मिला है। चोरी पकड़ में आने के बाद भी पीआर एजेंसी का ये दावा रहा कि यह आयोजन भी कान फिल्म फेस्टिवल जैसा ही होता है। 


इस बारे में वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजित राय विस्तार से समझाते हुए बताते हैं, ‘कान वर्ल्ड फिल्म फेस्टिवल वैसा ही जैसे फेस्टिवल हर साल मुंबई में होने दादा साहब फाल्के के नाम पर दर्जनों की तादाद में होते हैं। भारत सरकार ही सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार साल में किसी एक सिने शख्सियत को देती है। बाकी सारे पुरस्कार सिर्फ उनके नाम को भुनाने के लिए और प्रायोजकों से उगाही के लिए आयोजित किए जाते हैं। ठीक इसी तरह कान फिल्म फेस्टिवल के नाम पर ये जितने भी पुरस्कार समारोह होते हैं, उनका उद्देश्य सिनेमा का उत्थान तो नहीं ही होता है।’ 

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