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एकनाथ शिंदे, उद्धव ठाकरे
– फोटो : ANI
विस्तार
लोकसभा की 78 सीटों वाले पश्चिमी भारत के पांच राज्यों के नतीजे देश की भावी राजनीति की नई दिशा व दशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। पश्चिमी भारत हिंदुत्व के असली अलंबरदार का पता ठिकाना देगा। नतीजे बताएंगे कि महाराष्ट्र में असली शिवसेना उद्धव ठाकरे की है, या एकनाथ शिंदे की? असली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) शरद पवार की है या भतीजे अजित पवार की? इसी राज्य के नतीजे तय करेंगे कि हिंदुत्व व धर्मनिरपेक्षता का मिलान संभव है या नहीं? नतीजे यह भी बताएंगे कि हिंदुत्व की सबसे बड़ी प्रयोगशाला और हिंदुत्व के गढ़ में कांग्रेस और उसकी अगुवाई में विपक्षी दलों के गठबंधन का वाकई कोई भविष्य है या नहीं?
महाराष्ट्र- 48 सीटें
- भाजपा-23
- शिवसेना- 18
- कांग्रेस- 01
- एनसीपी- 04
महाराष्ट्र : पवार-उद्धव का तय होगा कद
बीते दस साल में भारतीय राजनीति के सबसे बड़े बदलाव का सूत्रधार महाराष्ट्र है। लोकसभा के बीते दो चुनावों में भाजपा-शिवसेना की जोड़ी ने कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को कहीं का नहीं छोड़ा है। इन दो चुनावों में राजग ने राज्य की 48 में से 42 सीटों पर कब्जा कर केंद्रीय राजनीति में हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने के साथ नए सियासी समीकरण बनाए थे। हालांकि बीते चुनाव के बाद मूल शिवेसना के पाला बदलने और एनसीपी के दो हिस्सों में बंट जाने से सियासी लड़ाई दिलचस्प हो गई है। पहली बार विपक्षी गठबंधन महा विकास आघाड़ी (एमवीए) और सत्तारूढ़ गठबंधन महायुति के बीच सीधी टक्कर होगी।
करो या मरो की जंग
मूल पार्टियों में टूट के बाद यह चुनाव शरद पवार और उद्धव ठाकरे के लिए करो या मरो की जंग की तरह है। पुराना प्रदर्शन दुहराने में नाकाम रहने के बाद पवार और ठाकरे भारतीय राजनीति में इतिहास बन सकते हैं। इसके उलट इनका बेहतर प्रदर्शन भाजपा को करारा झटका दे सकता है। भाजपा की रणनीति शिंदे और अजित के बहाने हिंदुत्व और ग्रामीण महाराष्ट्र का निर्विवाद सबसे बड़ा खिलाड़ी बनने की है। भाजपा उद्धव की बाला साहब ठाकरे की विरासत पर ग्रहण लगाने के लिए उनके चचेरे भाई राज ठाकरे के भी संपर्क में है।
मूल पार्टी किसकी…तय करेगा जनादेश
- दरअसल महाराष्ट्र में भाजपा से किनारा करने पर पहले शिवसेना और विरासत के सवाल पर एनसीपी दो फाड़ हो गई।
- मूल शिवसेना के एनसीपी, कांग्रेस के साथ सरकार बनाने पर एकनाथ शिंदे ने अलग लाइन ली और कई विधायकों-सांसदों को अपने साथ जोड़कर भाजपा के साथ महायुति की सरकार का रास्ता साफ किया।
- विरासत के सवाल पर अजित पवार अपने चाचा शरद पवार से अलग होकर नई सरकार में डिप्टी सीएम बन गए।
- अब नतीजे बताएंगे कि मूल शिवसेना और मूल एनसीपी आखिर किसकी है? पवार और ठाकरे की सियासी पकड़ की पैमाइश उनके राजनीतिक कद का भी निर्धारण करेगा।
गुजरात : कांग्रेस-आप साथ तो बढ़ा असंतोष
गुजरात में बीते दो चुनावों में सभी 26 सीटों पर कब्जा कर भाजपा ने विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस के फिर से मजबूत होने की संभावनाओं पर पानी फेरा है। भाजपा को पटखनी देने के लिए कांग्रेस ने इस बार आप के साथ समझौता किया है। हालांकि इस समझौते के बाद पार्टी में असंतोष के सुर बेहद मजबूत हुए हैं। कई नेताओं ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया है। बीते चार में चार विधायक कांग्रेस छोड़ चुके हैं। इनके अलावा पूर्व विधायक अंबरीश डेर और राज्यसभा सांसद नाराण राठवा भी पार्टी से अलग हो चुके हैं।
कांग्रेस की दिक्कतों में इजाफा किया है दिल्ली के आबकारी नीति घोटाले ने। आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल शराब घोटाले में सलाखों के पीछे हैं। दूसरी ओर, भाजपा के दो उम्मीदवारों ने भी पार्टी में नाराजगी के बाद चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया। यकीनन यह मुद्दा गरमाएगा।
गुजरात : कुल सीटें 26
- भाजपा- 26
- कांग्रेस- 00
गोवा: कुल सीट 02
- भाजपा- 02
- कांग्रेस- 00
तीन राज्यों से भी मिलेंगे संकेत
गुजरात के अलावा पश्चिम भारत में गोवा और दो केंद्रशासित प्रदेश दादरा एवं नगर हवेली के साथ दमन और दीव हैंै। इन तीन राज्यों की सियासी ताकत चार सीटों की है। इनमें सियासी दृष्टि से दो सीटों वाला राज्य गोवा अहम है, जहां बीते चुनाव में कांग्रेस और भाजपा को एक-एक सीट मिली थी। दादरा एवं नगर हवली की इकलौती सीट से निर्दलीय तो दमन और दीव क इकलौती सीट पर भाजपा को जीत हासिल हुई थी।
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