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ग्राउंड रिपोर्ट।
– फोटो : अमर उजाला
विस्तार
गोड्डा लोकसभा क्षेत्र में ही प्रसिद्ध धार्मिक स्थल देवघर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा वैद्यनाथ का धाम है। हालांकि, धार्मिक पर्यटन के लिहाज से इस शहर का स्वरूप भव्य नहीं बन सका है। मंदिर के इर्द-गिर्द बसे बाजार और मकान इस राह में रोड़ा बने हैं। तीन बार के भाजपा सांसद निशिकांत दुबे देवघर में भी काशी जैसा कॉरिडोर बनाना चाहते हैं। वह अपने क्षेत्र में विकास कार्यों के कारण लोकप्रिय भी हैं, मगर इस बार कॉरिडोर का मुद्दा उनकी राह का रोड़ा बनता दिख रहा। दरअसल, देवघर के पंडे-पुजारी कॉरिडोर का विरोध कर रहे हैं। उनकी चिंता है कि कॉरिडोर बनेगा तो सब मंदिर क्षेत्र से बाहर हो जाएंगे। विपक्षी गठबंधन भी इस विरोध को हवा दे रहा है। इसे लेकर झारखंड का मिथिलांचल कहे जाने वाले गोड्डा में सियासी हलचल मची हुई है।
राजनीतिक तौर पर मैथिल ब्राह्मणों का मिथिलांचल में खासा दखल है। हालांकि, चुनावी पंडित अब ब्राह्मणों में कई धड़े ढूंढ़ते हैं, तो वहीं मुस्लिम, यादव, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ, पंचगनिया दलित और वैश्य में जोड़-घटाकर सभी दल अपना-अपना गणित बैठाने में जुटे हैं। कांग्रेस ने निशिकांत के सामने पहले महगामा विधायक दीपिका पांडेय सिंह को प्रत्याशी बनाया पर बाद में पोड़ैयाहाट के विधायक प्रदीप यादव को टिकट थमा दिया। इसकी वजह जातीय गुणा-गणित ही मानी जा रही है। देवघर शहर में भाजपा का वर्चस्व माना जाता है, लेकिन गांवों में विपक्षी गठबंधन मजबूत है। लिहाजा, मुकाबला कड़ा है। इन हालात में भाजपा की चिंताएं बढ़ती बताई जा रही हैं।
गोड्डा लोकसभा क्षेत्र में मतदान एक जून को होगा। भाजपा को उम्मीद है कि निशिकांत इससे पहले पंडों का विरोध शांत कर लेंगे। देवघर मंदिर के बाहर संकरी गलियों में पूरा बाजार बसा है। घनी-संकरी गलियों में नीचे दुकानें और ऊपर मकानों में पुजारियों के अलावा ब्राह्मण और वैश्य ही अधिक हैं। श्याम गुप्ता बताते हैं कि मंदिर से सटा इलाका ही कॉरिडोर में आ रहा है, इसलिए पंडे विरोध कर रहे हैं। देवघर चौक के पास पान की गुमटी पर शाम की मंडली जमाए मोहन और मुकेश ने बताया कि पंडे-पुजारियों का विरोध उनकी रोजी-रोटी से जुड़ा है, इसलिए जल्दी मानेंगे नहीं। खुलकर विरोध नहीं करेंगे तो भितरघात होगा।
हालांकि, तमाम दुकानदारों का मानना है कि कॉरिडोर बनने से देवघर दुनिया के नक्शे पर सही मायनों में चमकेगा। बताते हैं कि जसीडीह जंक्शन बनने से पहले ट्रेनों की बड़ी दिक्कत थी। अब सारी बड़ी ट्रेनें देवघर (जसीडीह) से होकर जाती हैं। पर्यटन बढ़ा है। यह सारा विकास कॉरिडोर की ही कड़ी में है। शिक्षक शंकर प्रसाद सिंह कहते हैं, जो बरसों में यहां नहीं हुआ, निशिकांत ने कुछ समय में ही कर दिखाया। रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, सड़क चौड़ीकरण, अस्पताल हर नजरिए से विकास हुआ है। विरोध के मुद्दे पर बोले-निशिकांत को छोड़िए…यहां भाजपा ही जीतती है।
देवघर से करीब 75 किलोमीटर दूर गोड्डा को भी राजधानी रांची की तरह सजाया जा रहा है। गोड्डा का कलक्ट्रेट दफ्तर दिल्ली-लखनऊ के सरकारी कार्यालयों को मात देता दिखता है। देवघर से गोड्डा तक सड़कें चौड़ी की जा रही हैं। लेकिन, गोड्डा कोतवाली के सामने नुक्कड़ सभा कर रहे दिलीप महतो इससे अप्रभावित दिखे। बोले- बड़े-बड़े सरकारी भवन बनाकर विकास दिखाया जा रहा है। आम आदमी परेशान है..। निशिकांत सिर्फ देवघर के नेता हैं। इस बार उनकी पहले जैसी हवा नहीं है।
बाहरी-भीतरी भी मुद्दा
बिहार के मिथिलांचल से सटा गोड्डा लोकसभा क्षेत्र मिथिला का आंचल माना जाता है। यहां बड़ी आबादी मैथिल ब्राह्मणों की है, इसके बाद कान्यकुब्ज हैं। कई बार ये एक दूसरे के आमने-सामने होते हैं। ज्यादातर कान्यकुब्ज उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व गढ़वाल से आकर यहां बसे हैं। निशिकांत दुबे कान्यकुब्ज ब्राह्मण हैं। वह बिहार के भागलपुर के रहने वाले हैं। इस कारण बाहरी-भीतरी का मामला भी उठता रहा है।
क्या कहते हैं जातीय समीकरण
- 19,95,192 कुल मतदाता इस लोकसभा क्षेत्र में
- गोड्डा लोकसभा क्षेत्र में कुल वोटरों की अनुमानित संख्या 19,95,192 है।
- जातिगत आंकड़े देखें तो यहां सर्वाधिक आबादी मुस्लिम (करीब 3.50 लाख) की है।
- यादव 2.50 लाख, ब्राह्मण 2.50 लाख व वैश्य भी 2.50 से 3.0 लाख के आसपास हैं।
- आदिवासी 1.50 से 2.0 लाख और राजपूत, भूमिहार और कायस्थ की संख्या एक लाख के करीब है। वहीं, शेष पंचगनिया दलित हैं।
- भाजपा के कोर वोटर वैश्य और सवर्ण माने जाते हैं। वहीं, कांग्रेस को उम्मीद है कि मुस्लिम और यादव मतदाताओं का उसे साथ मिलेगा।
प्रदीप यादव की उम्मीदवारी के पीछे चुनावी अनुभव से लेकर ओबीसी मतों के गणित तक कई तर्क दिए जा रहे हैं। वह 2002 में भाजपा के टिकट पर गोड्डा सीट से उपचुनाव जीत चुके हैं। गठबंधन के तहत हिस्से में आई सीटों पर कांग्रेस कोई जोखिम लेना नहीं चाहती। यही वजह है कि उसने नए चेहरे को टिकट देने के बाद यू-टर्न लेकर पूर्व सांसद पर दांव लगाया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रदीप यादव झारखंड विकास मोर्चा से लड़े और 4.5 लाख से अधिक मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे।
मुस्लिम-यादव के गणित पर कांग्रेस ने बदला टिकट
प्रदीप यादव की उम्मीदवारी के पीछे चुनावी अनुभव से लेकर ओबीसी मतों के गणित तक कई तर्क दिए जा रहे हैं। वह 2002 में भाजपा के टिकट पर गोड्डा सीट से उपचुनाव जीत चुके हैं। गठबंधन के तहत हिस्से में आई सीटों पर कांग्रेस कोई जोखिम लेना नहीं चाहती। यही वजह है कि उसने नए चेहरे को टिकट देने के बाद यू-टर्न लेकर पूर्व सांसद पर दांव लगाया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रदीप यादव झारखंड विकास मोर्चा से लड़े और 4.5 लाख से अधिक मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे।
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